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Thursday, October 27, 2016

लैंसडाउन की सैरः साहसिक व रोमांचकारी यात्रा


गाँधी चौक, लैंसडाउन
भुल्ला ताल का एक दृश्य
भुल्ला ताल का एक दृश्य
मौज-मस्‍ती करना, घूमना-फिरना किसे अच्‍छा नहीं लगता। अपनी तनाव व व्‍यस्‍त जिंदगी से हर कोई उब जाता है, तो सोंचता है कहीं घूम के आते हैं, मन हल्‍का हो जाएगा। हर कोई बड़ा ही उत्‍साहित होता है, जब किसी यात्रा पर जाने की बात चल रही हो। अंकुर मेरे दफ्तर का बहुत ही हाजिरजवाब लड़का है। लैंसडाउनजिला - पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखण्ड बाइक से घूमने जाने की योजना बना रहा था। मैं अपने दफ्तर में अंकुर के पीछे बैठता हूँ, इसलिए सारी बातें सुन रहा था, फिर बीच में ही टोककर मैंने भी लैंसडाउन जाने के लिए हामी भर दी। दो सप्ताह पहले ही जाने की योजना बना लिया था। अगले सप्ताह में शुक्रवार को जाना तय हो गया। फिर वो शुक्रवार 21 अक्टूबर 2016 आ ही गया, जिस दिन का हमें बेसब्री से इन्‍तजार था। हमने आपस में बात किया तो पता चला हम चार लड़के जाने के लिए तैयार हैं। शुक्रवार के दिन हमलोग पूरे तैयारी के साथ घर से सामान वगैरह लेकर के दफ्तर पहुँचे; इस दिन पता चला हमारे साथ एक लड़का हिमांक भी जाने के लिए राजी हो गया है। शाम को जाने से पहले हिमांक और अंकुर में आपसी बहस चल रही थी कि हमलोग लैंसडाउन चलें या कसौली। पाँच लड़कों में से हिमांक लैंसडाउन जाने को कह रहा था चुकि लैंसडाउन, कसौली (हिमाचल प्रदेश) से किलोमीटर के हिसाब से थोड़ा कम दूर था और रात में ही जाने की योजना बनी हुई थी, इसलिए लैंसडाउन ही जाने का तय हुआ। पेट्रोल पम्प पर हमने बाइक की टंकी पूरा भरवा लिया ताकि रास्ते में कोई पेट्रोल न लेना पड़े। अंकुर फिर भी नहीं मान रहा था वह कसौली जाने की जिद पर अड़ा हुआ था। फिर, मैंने भी लैंसडाउन जाने के लिए ही जोर दिया; अंततः हमलोग पेट्रोल पम्प से लैंसडाउन की ओर चल पड़े। गाजियाबाद में रूककर हमलोगों ने पराठे खाये, करीब पौने आठ बजे रहे थे, अंकुर घर से ही सबके लिए पराठे बनवाकर लाया हुआ था; फिर पानी पीया और राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 58 पर चल पड़े। मेरठ होते हुए हमलोग 90-110 के गति से बाइक चलाते हुए जा रहे थे। खतौली बाइपास के नजदीक ही एक चाय के दुकान पर हमलोगों ने चाय पीने के लिए गाड़ी रोके। सभी ने वहाँ चाय पीया और बचे हुए पराठे खाये। वहाँ से खतौली होते हुए कोटद्वार की ओर जाना था, लेकिन हमलोग डर रहे थे कि उस रास्ते में रात में लूट-पाट होती है; फिर चाय वाले ने भी कहा खतौली का रास्ता सुरक्षा के दृष्टिकोण से ठीक नहीं है। यह सोंचकर सबने कहा जान है तो जहान है। हमलोग सीधा मुजफ्फरनगर के रास्ते होते हुए जाने का तय किया जो खतौली के रास्ते से इस रास्ते में 40 किलोमीटर ज्यादा गाड़ी चलाना था। गाड़ी 40 किलोमीटर ज्यादा चले तो कोई बात नहीं, लेकिन सुरक्षित पहुँचना ज्यादा जरूरी था, हम सबने आपस में बातचीत की। मुजफ्फरनगर तक तो हमलोग राष्ट्रीय राजमार्ग पर चले रहे थे, सड़कों के मध्‍यस्‍थ खम्भों की बत्ती जल रही थी, इसलिए कोई डर नहीं था। अब यहाँ से शुरू हुई जानसठ जाने के रास्ते जो रात में बहुत ही भयानक और सुनसान था। चारों तरफ सन्नाटे छाये हुए थे, सड़क के दोनों ओर खेतों में ईंखों के झुरमुट, घना अंधेरा, रात के करीब दस बजे थे, आसमान में आधा चाँद उगने ही वाले थे जो थोड़ा अंधेरा दूर कर रहा था। हमलोग तीन बाइकों पर पाँच लड़कें ऐसे गाड़ी भगा रहे थे जैसे पीछे से कोई चूड़ैल पीछा कर रही हो। मैं मन-ही-मन यह भी सोंच रहा था कि पागल कुत्ते ने हमलोगों को काट रखा है, जो इतनी रात को इस सुनसान, विरान रास्ते पर कहीं जाने की सोंच रहे हैं। लेकिन, यह देखकर थोड़ा डर कम हो गया कि हमारे साथ-साथ कुछ ट्रक और टैक्सी आगे या पीछे चल रहे थे।
आज के आधुनिक युग में गुगल नक्शा बड़ा ही काम का हो गया है जो कहीं जाना हो तो रात के घने अंधेरे में भी साथ नहीं छोड़ता। नहीं तो, एक जमाना था कि रात के सफ़र में रास्ते पूछने के लिए स्थानीय लोगों को ढूंढना पड़ता था। मेरा बाइक सागर चला रहा था क्योंकि मैं करीब 80 किलोमीटर बाइक चला चुका था, इसलिए थक गया था। मैं हिमांक के बाइक पर पीछे बैठा हुआ था। मेरे हाथ में अपना मोबाइल था जिसपर गुगल नक्शे के सहारे रास्ते को ढूंढते हुए जा रहे थे। हमलोग उस विरान सड़कों से होते हुए जानसठ पहुँचे। जानसठ से मिरानपुर की ओर रास्ते ठीक थे मतलब दोनों तरफ गाँव/घर दीख रहे थे, मिरानपुर पहुँचे। यहाँ एक ढाबे पर हमलोगों ने चाय पीया थोड़ी बातचीत की और फिर जैसे ही चलने को तैयार हुए तो मुझे शौच जाने जैसा महसूस हुआ। मैंने सोंचा ढाबा है तो यहाँ शौचालय होगा, पूछने पर पता चला शौचालय है। फिर दो मिनट में ही शौच करके हमलोग चल पड़े बिजनौर की ओर। बिजनौर से नजीबाबाद के रास्ते भी सुनसान थे, कहीं-कहीं रास्ते में खड्ढे भी थे, जो कि बाइक के लिए बड़े ही खतरनाक थे। दो बार मेरी बाइक सड़क के खड्ढे में पड़ा, फिर कैसे-कैसे करके हमने सम्भाला। हिमांक और अंकुर की अभेन्जर, बजाज की 220 सीसी की बाइक थी, इसलिए वो दोनों तो बड़े मस्ती से 110 के गति में जा रहे थे। वो दोनों करीब 1 किलोमीटर आगे, मैं पीछे-पीछे चल रहा था, क्योंकि मेरी बाइक 110 सीसी की हीरो पैशन एक्सप्रो थी; फिर भी मैं 95 की गति से बाइक हाँक रहा था। सड़क के दोनों ओर लगे आम के वृक्ष सड़कों पर ऐसे झुक रहे थे, जैसे रात के अंधेरे में देखने पर प्रतीत हो रहा था हमलोग किसी सुरंग में जा रहे हों। दोनों आगे जाकर रूक जाते, फिर हमलोग एकसाथ इकट्ठा हो जाते। फिर वही सिलसिला चलता रहा और हमलोग नजीबाबाद पहुँचे। नजीबाबाद से कोटद्वार तक हमलोगों ने पूरी गति में बाइक चलाये, यह रास्ते भी बहुत ही सुनसान थे। मैं पीछे-पीछे बाइक चला रहा था इसलिए डर भी लग रहा था कि कहीं कोई बीच में रोक लिया तो हमारे साथ कोई अनहोनी हो जाएगा। वो दोनों आगे-आगे चले जाएँगे और जब तक पीछे आएँगे तब तक तो हम लूट चुके होंगे, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ; कहते हैं जाको राखै साईयाँ, मार सके न कोय बाइक से किसी लम्बे सफर पर, वह भी रात में जाना बड़ा साहसिक कार्य था। अपने आप में एक रोमांच पैदा कर रहा था, एक अनुठे पल का ऐहसास करा रहा था, इस तरह सूनसान रास्ते पर रात के अधखीले चाँद की चाँदनी में नहाते हुए जा रहे थे। करीब रात के दो से ढाई बजे होंगे, अंकुर अपनी पूरी गति में आगे-आगे जा रहा था मैं बीच में था और हिमांक अपने बाइक से पीछे था, वह पीछे से सीटी बजा रहा था यह इशारा करने के लिए कि हमलोग रूक जायें क्योंकि हमलोग गलत रास्ते पर जा रहे थे। लेकिन हिमांक का इशारा हमलोग नहीं समझ पाये और बाइक तेज गति से भगाए जा रहा था मानो तुफान से मुकाबला कर रहे हों। फिर हिमांक अपने बाइक की गति तेज करके अंकुर और मेरे पास आकर के बोला गुगल नक्शे के अनुसार हमलोग गलत रास्ते पर जा रहे हैं। फिर दो किलोमीटर पीछे आकर, फिर आगे की ओर मुड़े, रास्ते नहीं मिल रहे थे, फिर पीछे हुए इस तरह दो चक्कर लगाये तो पता चला कि यहीं से एक मोड़ है, जिससे चलकर हमलोग कोटद्वार पहुँचेंगे। इस तरह सूनसान रास्ते को झेलते हुए कोटद्वार के चौराहे पर हमलोग पहुँचे। रात के करीब तीन बजे होंगे, चौराहे से थोड़ा दस कदम आगे निकले ही थे कि चौराहे पर दो-चार स्थानीय लोग आपस में बातें कर रहे थे, उन्होंने टोका और पूछा लैंसडाउन? तो हमलोगों ने हाँ कहा, फिर उन्होंने बताया कि आप गलत जा रहे हैं यहाँ से दायें की ओर जाएँ। 
अब यहाँ से शुरू होता है छोटे-छोटे पहाड़ी घुमावदार रास्ते, कभी दायें, कभी बायें, फिर दायें, फिर बायें, कभी ऊपर की ओर तो कभी नीचे ढलान रास्ते, इस तरह हमलोग पहाड़ी मैदानों में रात में मानो कबड्डी खेलते हुए जा रहे थे। मेरे हमसफर दोस्त दोनों आगे चल रहे थे कभी मैं उनको पीछे कर देता फिर वो आगे हो जाते। इस तरह पूरे रास्ते करीब मैं ही पीछे रहा, मानो लुकाछीपी का खेल हो रहा हो क्योंकि टेढ़े-मेढ़े रास्ते थे तो कभी दीख जाते कभी छुप जाते। मैं पीछे था इस कारण डर भी लगता, तो उस समय हनुमान जी को याद करके मन-ही-मन हनुमान चालिसा पढ़ना शुरू कर देता। फिर हमलोग दुगड्डा पेट्रोल पम्प पर पहुँचे जो उन पहाड़ी क्षेत्र में एक मात्र पेट्रोल पम्प था। वहाँ पर हमलोगों ने लघुशंका करने के बाद थोड़ा विश्राम किया। ठंडी हवाएँ तेज चल रही थी, इसलिए ठंड से हमलोग काँप रहे थे। हमलोगों ने जैकेट पहन रखे थे, फिर भी ठंड लग रही थी। अल्पविश्राम के बाद फिर हमलोग आगे की ओर चल पड़े। ऊँचे-नीचे रास्ते, मुझे उस गाने की याद दिला रहे थे, जो फिल्मः खुद्दार (1982), में अभिनेता संजीव कुमार अपने दोनों छोटे भाईयों को विद्यालय ले जाते वक्त गाते हैं। ऊँचे-नीचे रास्ते और मंजिल तेरी दूर, बीच में राही रूक न जाना होकर के मजबूर...” ये गाने थोड़े हौंसला बढ़ा रहे थे। अब हम पहुँचे वहाँ, जहाँ से दो रास्ते निकल रहे थे, एक लैंसडाउन की तरफ और दूसरी वहीं से भगवान तारकेश्वर मंदिर जो कि ताड़ और देवदार वृक्षों के खूबसूरत वादियों के बीच अवस्थित हैं। हमें लैंसडाउन जाना था, यहाँ पर एक छोटा वाद-विवाद हुआ कि यह रास्ता लैंसडाउन जाता है, तो वह रास्ता लैंसडाउन जाता है। लेकिन वहाँ पर सूचनापट्ट लगे हुए थे जो लैंसडाउन के रास्ते बता रहे थे, फिर हमलोगों ने उसी के अनुसार चले पड़े। लैंसडाउन करीब यहाँ से चार किलोमीटर रह गये थे, कि इसी बीच मेरी बाइक भी जवाब देना शुरू कर दिया था, बेचारे को रातभर हाँक-हाँक करके परेशान जो कर रखा था। ऊँची चढ़ाई वाले रास्तों पर चढ़ने से बाइक बंद होने जैसा लग रहा था, लेकिन फिर भी हमने नहीं माना और आखिरकार हमलोग रात में ढनमनाते हुए लैंसडाउन के गाँधी चौक पर पहुँच गये। रात के करीब पौने चार बज चुके थे।
अंकुर ने जाने से पहले ही दिल्ली से ही लैंसडाउन के एक हिन्दू धर्मशाला के प्रबंधक से बात कर लिया था कि हमलोग रात के करीब 12 से 1 बजे तक आ जाएँगे। प्रबंधक ने कहा था पहुँचने के बाद द्वार पर दाई को बोल देना धर्मशाला खोल देंगी। अब, हमलोग ईश्वर के कृपा से सही-सलामत पहुँच तो गये थे, रह गयी थी ठहरने का कोई ठिकाना ढूंढना, तो हममें से अंकुर और मयंक दोनों मिलके ठिकाना ढूंढने निकले। इस बीच मैंने अपने मोबाइल से इंटरनेट चालु करके हिन्दू धर्मशाला ढूंढने का प्रयास किया, लेकिन आइडिया का नेट बिल्कुल ही धीरे चल रहा था, इस कारण मैं धर्मशाला नहीं ढूंढ पाया। जहाँ रूके थे वहीं पर एक मयूर होटल था उससे पूछने पर ठहरने का शुल्क ज्यादा बता रहा था इस वजह से हमलोग उसी हिन्दू धर्मशाला को ढूंढने निकले। ठंड भी काफी लग रही थी तो मैंने अपना दूसरा अधकटी बाजू वाला जैकेट भी बैग से निकाल कर पहन लिया। करीब आधा घंटा लगाने के बाद अंकुर और मयंक खाली हाथ वापस लौटा, यह कहने कि कोई ठहरने की व्यवस्था नहीं हुई। फिर, हिमांक और अंकुर फिर से हिन्दू धर्मशाला ढूंढने निकले और करीब पौने एक घंटे के बाद आये। हमलोग चल पड़े, कुछ ही दूर पर एक चाय-नास्ते की दुकान खुली हुई थी, चुकि करीब पौने पाँच बज चुके थे, भोर हो गयी थी इसलिए हमलोगों ने दुकान में बैठकर पावरोटी, नमकीन और चाय का नास्ता किया; पैसे चुकता करने के बाद हमलोग धर्मशाला की ओर चल पड़े। धर्मशाला के द्वार एक बुजूर्ग महिला ने दरवाजा खोली; फिर हमलोगों ने अपनी-अपनी बाईक धर्मशाला के परिसर में खड़ा कर दिया। उस महिला से ठहरने के सिलसिले में कुछ आपसी बातचीत हुई, फिर हमलोग ऊपर के कमरे में चले आये; जो चार से पाँच घंटों के लिए लिया था। सुबह के साढ़े पाँच बज चुके थे, हमलोग अपने-अपने बिस्तर पर लेट गये। सभी को तो नींद आ गयी लेकिन रातभर जागने और बाईक चलाने के बावजूद भी मुझे नींद नहीं आयी। फिर मैंने सोंचा झूठमूठ के सोने से कोई फायदा नहीं है, फिर मैं शौच करने चला गया। मुँह-हाथ धोने के बाद मैं छत पर टहलने निकला, कुछ सुबह के वहाँ के खूबसूरत पहाड़ियों का तस्वीर लिया। नीचे आया तो देखा हिमांक भी जगा हुआ था, पूछा तो बताया मुझे भी नींद नहीं आ रही है। अब, दोनों मिलकर टहलने निकले, थोड़ा ऊपर की ओर पहाड़ी पर चढ़ने पर कुछ बच्चें जो सुबह विद्यालय जाने के लिए तैयार थे, उनसे पूछा- छोटू, यहाँ कोई सार्वजनिक शौचालय है क्या? तो उसने बताया हाँ थोड़ा-सा और ऊपर जाने पर एक है। हिमांक शौच के बाद बाहर निकला, फिर हमदोनों बातचीत करते हुए अपने कमरे की ओर चल पड़े। रास्ते में नास्ते की दुकान पर गर्मागर्म जलेबी बनी हुई थी, खाने का मन हुआ लेकिन दातुन-मंजन हमदोनों ने नहीं कर रखा था, इसलिए कमरे पर चले आये। कमरे पर आने के बाद सोने का प्रयास किया लेकिन नींद नहीं आयी। अंकुर, मयंक और सागर बड़े निश्चिंत होकर गहरे नींद में सो रहे थे, जैसे कहते हैं- “घोड़ा बेचकर सो जाना
मैं फिर से अकेले टहलने निकल पड़ा करीब एक से डेढ़ घंटे लैंसडाउन के गाँधी चौक पर कभी टहलकर, तो कभी पत्थर के बने बेंच पर बैठकर बिताया। वहाँ का जनजीवन कैसे चलता है इसी को देख रहा था। मैं जिस बेंच पर बैठा था उसी के बगल में एक लड़का ताजा सब्‍जी जैसे— पालक, सहजन, और लौकी इत्‍यादि लेकर बेचने आया हुआ था। ज्‍यादातर वहाँ का जनजीवन दुकानों से ही चलते हैं या फिर किसी को नौकरी लगी हो तो। गाँधी चौक से कोटद्वार के लिए छोटी बसें और टैक्‍सी वगैरह चलते हैं, जिससे वहाँ के लोगों का आवागमन होता है। चारों तरफ पहाड़-ही-पहाड़ थे, खेती करने का कहीं कोई खेत देखने को नहीं मिला। फिर मैं वापस कमरे पर आ गया। समय बीता और हमलोग धर्मशाला प्रबन्धक से बातचीत तय होने के अनुसार दूसरे कमरे में चले आये जो साफ-सूथरे थे; बिछावन भी ठीक-ठाक था। हमसभी नहाकर तैयार हो गये और गाँधी चौक पर आकर मयूर होटल में पराठे, अचार और चाय का नास्ता किया और चल पड़े उन आकर्षण बिन्दुओं का सैर करने जहाँ के लिए हमलोग इतने उत्साहित हो रहे थे। सबसे पहले भुल्ला ताल गये, जो एक छोटा-सा ताल है, करीब 100 मीटर लम्बाई और 30 फीट गहराई था, जिसमें पर्यटक 80 रुपये शुल्क अदा करके नौकायन करते हैं। हम पाँचों ने नौका पर सवार होकर नौकायन का खूब आनंद उठाये, अनेकों तस्वीरें खिंचवायी। चारों ओर छोटे-छोटे पहाड़ी, लम्बे और घने वृक्षों के बीच भुल्ला ताल में नौकायन करके हमसभी बहुत ही रोमांचित हो रहे थे। ताल से निकलने के बाद ताल के बाजू में ही एक पेड़ के ऊपर लोहे का मचान बना हुआ था, जिसपर हमलोगों ने चढ़कर खूब सारी तस्वीरें खिंचवाये।
अब हमलोग निकल पड़े अगले आकर्षण बिन्दू की तरफ, अब ऐसे जगह पर पहुँचे जहाँ आगे की ओर गहरी खाई थी और हमलोग ऊपर पहाड़ी पर थे, यहाँ से खाई का खूबसूरत नजारा दीख रहा था। यहाँ पर कुछ बाईक वाली तस्वीरें खिंचवाये। ऊपर पहाड़ी पर चढ़ने के बाद एक केन्द्रीय विद्यालय मिला, जिसमें सुबह सभी बच्चे पढ़ने आये थे, वहाँ से पूछने के बाद हमलोग संतोषी माता मंदिर पहुँचे। अंकुर को भगवान के प्रति श्रद्धा नहीं है इसलिए वह वहीं पर एक पत्थर पर बैठ गया और हम चारों ने संतोषी माता के दर्शन किये, मंदिर में पानी के मयूर जग रखे हुए थे, वहाँ से बोतल में पानी भरा, पानी पीया और यहाँ कुछ तस्वीरें खिंचवाये और चल पड़े टीप-इन-टॉप की तरफ। पहाड़ों पर इतने रास्ते होते हैं कि अच्छे-अच्छे लोग उस जंगल में खो जाये, हमलोग रास्ता भटक चुके थे, तो वहीं पर एक स्थानीय महिला मिलीं, जिनसे हमलोगों ने टीप-इन-टॉप का रास्ता पूछा। फिर, पहुँचे टीप-इन-टॉप। टीप-इन-टॉप से छोटे-छोटे पहाड़ों के मनोरम दृश्य दिख रहे थे। प्रकृति के गोद में पहुँचकर असीम सुख की अनुभूति हो रही थी। यहाँ भी हमलोगों ने उन पहाड़ों से रमणीय दृश्‍य के बहुत सारे फोटो खिंचवाये। स्‍वच्‍छ भारत अभियान पूरे भारत में जोर-शोर से चल रहा है, लेकिन कुछ नालायक बच्‍चों पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता जो वहाँ मुझे देखने को मिला। एक लड़की को पॉलीथीन में उस टीप-इन-टॉप से नीचे खाई में कुछ फेंकते हुए देखा, उसी बीच मैंने टोका— “दोस्‍त, वहाँ कूड़ेदान रखा हुआ है आप उसमें कुड़ा फेंके”। तबतक वो कुड़ा फेंक चुके थे। एक लड़की के साथ दो लड़के थे। मुझे लगा कहीं बहस न हो जाए, लेकिन ऐसा कुछ न हुआ।
शाम के करीब चार बज चुके थे। हमसभी टीप-इन-टॉप से वापस लौटकर गाँधी चौक पहुँचे। वहाँ से पास ही में एक बाइक सर्विसिंग सेंटर था, वहाँ पहुँचकर हम सभी ने टायर में हवा भरवाये। फिर हमसभी ने तय किया कमरे पर वापस लौटने के बाद होटल में जाकर खाना खाएँगे। होटल में खाना खाने के बाद हमलोग कमरे पर वापस आ गये। शाम के छह बज चुके थे, कमरे में धीमी आवाज़ में पंजाबी गाने बजा रखा था, मुझमें और अंकुर में शेरों-शायरी का मुकाबला शुरू हो गया; मोमोज-चिकेन खाते हुए हमलोग खूब मौज-मस्ती कर रहे थे। यात्रा पर जाने का हमसभी भरपूर आनंद उठा रहे थे, रात के करीब साढ़े नौ बज गये। दिन-भर के थके-हारे मैं और सागर दूसरे कमरे में सोने के लिए चले आये। शुक्रवार रात का जगा हुआ और शनिवार दिन-भर का थका, मुझे बिस्तर पर लेटते ही गहरी नींद आ गयी।
सुबह चार बजे तक मेरी नींद पूरी हो चुकी थी, फिर भी रजाई के अंदर ही लेटा रहा। फिर, साढ़े पाँच बजे उठकर नित्य क्रिया से निवृत होकर टहलने निकला। गाँधी चौक पर आकर चाय पीया। थोड़ी देर, इधर-उधर घूमकर फिर वापस कमरे पर आ गये। आकर देखा तो पहले कमरे में सभी जनाब सो रहे थे, मैंने दरवाजा खटखटाकर उठाया। अंकुर ने दरवाजा खोला और फिर बिस्तर पर लेट गया। मैं दातुन-मंजन करने के बाद ठंडे पानी से नहाया और बाकी के बचे आकर्षण बिन्दु को देखने के लिए तैयार हो गया, तब तक अंकुर और मयंक बिस्तर पर लेटा ही रहा। करीब दो से तीन घंटे बाद सभी तैयार हुए और फिर धर्मशाला से निकल पड़े। धर्मशाला से थोड़े ही दूर पर एक कालेश्वर मंदिर है जिसमें मैं, हिमांक, सागर, और मयंक सभी दर्शन करने के लिए गये। द्वार के घंटे बजाते हुए मंदिर में प्रवेश किया शिवजी के साथ-साथ सभी देवी-देवताओं को प्रणाम किया, कुछ तस्वीरें खिंचवाये और वापस गाँधी चौक पर आ गये। मयूर होटल में नास्ते में समोसे, बन बटर और चाय पीया। फिर, होटल का बिल चुकता करने के बाद सौ साल पुरानी मिस्‍ठान के दुकान से बाल मिठाई सबने अपने-अपने जरूरत के अनुसार खरीदे। उसके बाद दरवान सिंह संग्रहालय गये, जो गाँधी चौक से पूरब और उत्तर में है। यह पूरा क्षेत्र सेना के अधीन है और गढ़वाल राइफल्स का गढ़ भी है। गढ़वाल राइफल्स युद्ध स्मारक तथा रेजिमेंट संग्रहालय है। यहाँ गढ़वाल राइफल्स से जुड़ी वस्तुओं जैसे युद्ध में उपयोग की गयी हथियार, हर प्रकार के बंदूकों की झलक देख सकते हैं। संग्रहालय शाम के 5 बजे तक ही खुला रहता है। संग्रहालय से सटा सैन्य प्रशिक्षण मैदान है, जिसे आम पर्यटक बाहर से ही सैन्य प्रशिक्षण का नजारा देख सकते हैं। वैसे, यह स्थान स्वतंत्रता आन्दोलन की कई गतिविधियों का गवाह भी रह चुका है। संग्रहालय देखने के बाद हिमांक और अंकुर वापस दिल्ली लौटने के लिए आगे आ गये। जबतक मैं अपनी बाइक सीधी कर रहा और हेलमेट पहन रहा था, तबतक दोनों अपने बाइक से थोड़ा आगे निकल गये थे। मैं जब नीचे उतरने के बाद गोल चक्कर पर पहुँचा तो यहाँ से दो रास्ते बन रहे थे जो मुझे दुविधा में डाल दिया कि किधर जाऊँ? पहाड़ों पर इतने रास्ते होते हैं कि हर कोई गच्चा खा जाए। अब मैंने सोंचा सागर को फोन करता हूँ। फिर मैंने फोन मिलाया तो उसने बताया कि मैं चौक के बाद खड़ा हूँ। फिर मैं अपने बाइक से आगे की ओर यानी वापस गाँधी चौक की ओर बढ़ गया और उसी बाइक सर्विसिंग सेंटर के पास जाकर खड़ा हो गया। फिर मैंने फोन मिलाया और बताया कि मैं बाइक सर्विसिंग सेंटर के पास खड़ा हूँ। अंकुर अपनी बाइक लेकर यहाँ आया। आपस की असमन्वय के कारण अंकुर से मेरी थोड़ी बहस भी हो गयी। अंततः हमसब इकट्ठा हुए और पहाड़ियों से नीचे की ओर उतरने लगे। पहाड़ियों के बीच-बीच में जहाँ-जहाँ दिलकश नजारें दिखे वहाँ रूककर हम सबने तस्वीरें खिंचवाये। इस तरह वापस कोटद्वार पहुँचे, वहाँ से नजीबाबाद होते हुए बिजनौर के रास्ते आगे बढ़ते गये। रास्ते में देखा कहीं-कहीं सड़क के किनारे गन्ने को कोल्हु में पेरकर गुड़ बनाये जा रहे थे। हिमांक को ताजे गुड़ लेने का मन हुआ। पहली जगह पूछा तो कोल्हु वाले ने मना कर दिया, कहा आगे कुछ कोल्हु हैं जहाँ से गुड़ मिल जाएँगे। आगे बढ़ने के बाद एक से पूछा तो उसने 45 रुपये किलो बताया जो बाजार में इतने रुपये में आसानी से मिल जाते हैं। कोल्हु से लेने पर सस्ते में न मिले तो क्या फायदा। आगे बढ़ने पर एक कोल्हु मिला जिसमें कुछ मुस्लिम और हिन्दू दोनों मजदूर गन्ने को पेरकर ताजे गुड़ बना रहे थे। वे 35 रुपये प्रति किलो गुड़ देने के लिए राजी हो गये। मैंने एक किलो, बाकी सबने दो-दो किलो गुड़ लिये, कुल मिलाकर हमने नौ किलो गुड़ खरीदे। पैसे चुकता करने के बाद हमलोग आगे बढ़े। भूख जोरों से लगी हुई थी, इसलिए एक ढाबे पर रूके और हमलोगों ने भर पेट खाने खाये। ढाबे से चलकर जानसठ के रास्ते, खतौली होते हुए मेरठ बाइपास पहुँचे। रास्ते में एक जगह फिर रूककर आराम किया और गाजियाबाद होते हुए हम सभी अपने-अपने घर को निकल पड़े। यह मेरे जीवन का पहला साहसिक और रोमांचकारी यात्रा था, जो अनोखा रहा जिसको हमलोगों ने बाइक से कुल 535 किलोमीटर सफर तय किया।
परिकल्पना व लेखनः संजय साह


भुल्ला ताल में नौकायन करते पर्यटक

भुल्ला ताल का एक दृश्य

भुल्ला ताल का एक दृश्य

श्री कालेश्वर मंदिर


रास्ते में रिसोर्ट

मयूर होटल के सामने चार दोस्त

मयूर होटल के सामने मयूर होटल के सामने बाइक पर

भुल्ला ताल परिसर

भुल्ला ताल परिसर


भुल्ला ताल के समीप लोहे के मचान पर


दोस्तों के साथ हँसी-मजाक करते हुए

भुल्ला ताल में नौकायन का आनंद उठाते हुए

रास्ते में एक घाटी का दृश्य

रास्ते में कोल्हू में ईख पेरकर गुड़ बनाते हुए

Sunday, October 16, 2016

बसों व ट्रकों में लगे कानफाड़ू हॉर्न बजाने के विरोध में परिवहन मंत्री बिहार से एक विनम्र गुजारिश

बसों व ट्रकों में लगे हॉर्न इतना तेज, कानफाड़ू होते हैं कि दिल के मरीजों से लेकर आमजन तक का जीना हराम हो गया है, कम-से-कम उन विद्यालयों का तो ख्याल रखना चाहिए जो सड़क किनारे बने हैं जिसमें हमारे बच्चे पढ़ रहे हैं। इन बच्चों की पढ़ाई कैसी होगी यह सोंचकर हैरानी होती है। फिर भी बिहार के परिवहन विभाग मंत्री इस पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं करते, मालूम नहीं। मैं बात कर रहा हूँ उन तमाम बिहार के राष्ट्रीय व राज्यीय राजमार्गों पर चलने वाली डिलक्स सेवा वाली बसों तथा ट्रकों की जो बिना रूके लगातार हॉर्न इतने तेज आवाज़ में बजाते हैं कि लगता है दिमाग फट जाएगा। ये कैसा बिहार है? जहाँ पर कोई सुव्यवस्थित कानून-व्यवस्था नहीं है। नेता लोग सिर्फ लुभावने वादे, भाषण व राजनीति में लगे रहते हैं और इस तरह की समस्याओं पर किसी का ध्यान क्यों नहीं जाता? समस्याओं की गिनती कराएँ तो हजारों ऐसे समस्याएँ हैं जिनसे बिहार में रोज ही दो-चार होना पड़ता है, जिसमें से एक भोजपूरी के अश्लील गानों का तेज आवाज़ में लाउड-स्पीकर बजाना भी है। मनुष्य को अभिव्यक्ति की आजादी है, इसका मतलब यह कतई नहीं है कि किसी दूसरे या सार्वजनिक को कोई नुकसान पहुँचाया जाए। जहाँ तक कानून की बात करें तो इसके लिए कानून बने हुए हैं जिसके तहत सजा का प्रावधान है लेकिन फिर भी वाहन वाले बेफ्रिकी से अबतक वाहन चलाते आये हैं और कोई कानून-व्यवस्था इस पर आजतक ध्यान नहीं दिया। मैं जब भी अपने गाँव सप्ताह भर के लिए जाता हूँ, घर पर चैन की नींद लेना दुश्वार हो जाता है, क्योंकि मेरा घर बिल्कुल ही राज्यीय राजमार्ग संख्या - 49 के किनारे अवस्थित है।

कुछ ही साल पहले एक अधिकारी इसी राज्यीय राजमार्ग संख्या - 49 से गुजर रहे थे, उन्हें रास्ते में कुछ ठोकरें मिलीं जो गाँव-देहात के सड़कों पर अक्सर मिल जाते हैं तो उन्होंने आदेश देकर सारे ठोकरें बुल्डोजर से तोड़वाकर रास्ते को समतल बनवा दिया ताकि गाड़ियों को दौड़ाने में कोई रूकावट न आए। क्या? कोई अधिकारी को ही कोई तकलीफ हो तभी कोई कानून-व्यवस्था में सुधार या परिवर्तन कराया जा सकता है, और आम जनता चाहे जैसे भी रहे कोई मतलब नहीं? यह तो वही बात हो गयी कि “बस्ती के कत्लेआम पे निकली न आह, खुद को लगी चोट तो दरिया बहा गये...”

अतः परिवहन मंत्री माननीय श्री चंद्रिका बाबू से मेरी विनम्र प्रार्थना है कि इस समस्या को ध्यान में रखकर कानफाड़ू हॉर्न तथा अश्लील गानों के प्रति उचित कार्रवाई करें। जिससे यह साबित हो सके कि बिहार में सचमुच में सुशासन व्यवस्था है, जिसका डंका हमारे सुशासन बाबू नीतीश कुमार जी तथा उनके पार्टी के सदस्य पीटते रहते हैं।


एक आम नागरिक
संजय साह
वैशाली, बिहार

Wednesday, September 21, 2016

अस्सी चुटकी नब्बे ताल, खा के खैनी पंखे पर डाल...

अस्सी चुटकी नब्बे ताल, खा के खैनी पंखे पर डाल... फिल्मों के गाने जनमानस को ज्यादा ही प्रभावित करते हैं। खैनी, गुटखा खाने वाले लोग तो बड़े ही शान से खाते हैं और गंदगी भी करने में कोई कोताही नहीं बरतते हैं। यह झुठी शान ही हमारे देश के हर सरकारी दफ्तरों के सीढ़ियों, ऐतिहासिक इमारतों, ट्रेनों में लगे पंखे के ऊपर, इत्यादि जगहों को गंदा कर रहा है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्र का नाम बदनाम हो रहा है।

गाड़ी संख्या 13257-58/जनसाधारण एक्सप्रेस, नाम सुनने से ही मालूम पड़ता है कि किस वर्ग के लोग इन ट्रेनों में सफर करते हैं। इस ट्रेन की एक खासियत यह भी है कि इनमें सभी डिब्बे साधारण बोले तो बैठकर सफर करने वाले हैं। अगर शयनयान श्रेणी में जगह न मिले तो यह ट्रेन एक बेहतर विकल्प है, जिसमें मजबूरी में निम्न वर्ग के लोग से लेकर आला अधिकारी भी सफर करते हैं। मुझे भी तत्काल टिकट सम्पुष्ट न होने पर एक सप्ताह पहले इस ट्रेन में सफर करने का मौका मिला। आनंदविहार में मैं ऊपर के शायिका पर बैठ गया, ट्रेन का डिब्बा इतना भरा हुआ था कि आराम से लोग बैठे हुए थे; और मैं भी रात में पूरे इत्मीनान से सोकर सफर किया और साधारण किराया में शयनयान श्रेणी का आनंद उठाया। हाँ, भले ही गद्दीदार शायिका नहीं थी लेकिन सोकर के जाना ही मेरे लिए काफी था। 

ट्रेनों में सफर के दौरान बीड़ी, सिगरेट, तम्बाकु, जर्दा, गुटखा, लोग ख़ूब खाते हैं और गंदगी भी ख़ूब करते हैं। साफ-सफाई के लिए पूरे भारत में स्वच्छ भारत अभियान भी चलाया जा रहा, लेकिन इन मजदूर वर्गों को समझाना "भैंस के आगे बिन बजाये, भैंस गये पगुराये" के समान है। हाँ, अब तो ट्रेन में मैंने देखा कि कूड़ेदान भी बना दिये गये हैं। फिर भी लोग खैनी खाकर पंखे के ऊपर ही डालते हैं।

इसके लिए आमजन जिम्मेदार तो है ही, साथ-साथ उन सफाई कर्मचारियों की भी लापरवाही है, जो सफाई करने पर ध्यान ही नहीं देते। ये तस्वीरें हकीकत बयान कर रही है कि किस तरह ट्रेन में गंदगी फैली है और लोग सिगरेट के डिब्बे, खैनी के पन्नी किस तरह पंखे के भीतर ठूँस रखा है।

संकलन व लेखन: संजय साह



Wednesday, September 7, 2016

मेरे ग़ज़ल

तेरे प्यार में इस तरह पागल हूँ मैं
कि तेरे नज़रों के तीर का घायल हूँ मैं

इस कदर दीवाने हैं, हम तेरे हुस्न का
इन गोरे-गोरे पैरों का पायल हूँ मैं

तेरी आँखों का नूर, मुझसे ही तो है
जो लगे आँखों में काज़ल हूँ मैं

बहार लाती है फ़ि‍ज़ाओं में जो सावन
वही सावन का बादल हूँ मैं

आजमाँ के तो देख, ऐ मेरे सनम
तेरे इस प्यार के, कायल हूँ मैं

रचनाकारः संजय साह


शब्दार्थ:— नूर (प्रकाश, चमक); फ़ि‍ज़ाओं (वातावरण); कायल (सहमत, यकीन दिलाना)

Friday, July 29, 2016

वैशाली

वैशाली जहाँ से सर्वप्रथम प्रजातंत्र शासन प्रणाली का उदय हुआ था। विश्‍व को सर्वप्रथम गणतंत्र का ज्ञान करानेवाला स्‍थान वैशाली ही है। वैशाली का नामाकरण रामायण काल के एक राजा ईक्ष्वाकु वंशीय राजा विशाल के नाम पर हुआ है। वैशाली बिहार राज्य का एक जिला है, जो राज्य की राजधानी पटना से लगभग 45 कि.मी. दूर उत्तर में है। यहाँ पर सम्राट अशोक का अशोक-स्तम्भ है, जिसको भीम की लाठी भी कहा जाता है (देखें: चित्र)। यहाँ सम्राट अशोक का गढ़ भी है। जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर का जन्म इसी जिला में कुंडग्राम नामक स्थान पर हुआ था, जो वैशाली गढ़ से कुछ दूरी पर है। भगवान बुद्ध ने वैशाली के समीप कोल्‍हुआ में अपना अंतिम सम्बोधन दिया था।

वैशाली कि नगरवधु आम्रपाली विश्वप्रसिद्ध राजनर्तकी थी। मगध सम्राट बिंबसार ने आम्रपाली को पाने के लिए वैशाली पर जब आक्रमण किया तब संयोगवश उसकी पहली मुलाकात आम्रपाली से ही हुई। आम्रपाली के रूप-सौंदर्य पर मुग्ध होकर बिंबसार पहली ही नजर में अपना दिल दे बैठे थे। माना जाता है कि आम्रपाली से प्रेरित होकर बिंबसार ने अपने राजदरबार में राजनर्तकी के प्रथा की शुरुआत की थी। बिंबसार को आम्रपाली से एक पुत्र भी हुआ जो बाद में बौद्ध भिक्षु बना।

वैशाली जिला की बात हो और हाजीपुर शहर की चर्चा न हो ऐसा हो हीं नहीं सकता। हाजीपुर के पास से हीं गुजरने वाली गंडक नदी है जिसके एक किनारे हाजीपुर और दूसरे किनारे सोनपुर छोटा शहर बसा हुआ है। जहाँ पर एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला लगता है। यह मेला कार्तिक पूर्णिमा से शुरू होकर एक महीना तक रहता है। जहाँ पर बहुत से विदेशी पर्यटक भी मेला देखने आते हैं। सोनपुर रेलवे मार्ग से भी जुड़ा हुआ है। सोनपुर की रेलवे प्लेटफार्म भारत की तीसरी सबसे बड़ी (लम्बाई में) प्लेटफार्म है।

हाजीपुर से सटा हुआ गंडक नदी के एक किनारे कौनहारा घाट है, जिसके बारे में कहा जाता है, प्राचीन समय में यहाँ गज (हाथी) और ग्राह (मगरमच्छ) में लड़ाई हुई थी। जब हाथी को मगरमच्छ ने घायल करके पानी में डूबोए जा रहा था, तब हाथी ने नदी से कमल का पुष्प तोड़कर, भगवान विष्णु का आराधना किया था और भगवान विष्णु प्रसन्न होकर आए और मगरमच्छ को अपने सुदर्शन चक्र से काटकर हाथी के प्राण की रक्षा की थी। तभी से लोगों द्वारा कहे जाने लगा गज और ग्राह में हुई लड़ाई तो कौन हारा? इसलिए इस घाट को कौनहारा घाट कहते हैं।

इस गंडक नदी के तट पर पैगोडा शैली में निर्मित नेपाली वास्तुकला का एक अद्भुत नमूना देखा जा सकता है, जिसे नेपाली छावनी कहते हैं। शायद दुनिया का एक मात्र ऐसा शिव मंदिर है, जिसके मुंडेर पे कामसूत्र के आसन खुदे हुए हैं। कहते हैं जब वास्तुकार ने इस पवित्र शिव मंदिर पे कामसूत्र के आसन का नक्काशी करके लगाया था तो अंग्रेज सरकार ने उनके हाथ काट लिये थे, ऐसा लोगों का मानना है।

हाजीपुर में ही रामचौरा नामक एक स्थान है, जहाँ पर भगवान रामचंद्र जी जब विवाह करके वापस जनकपुर (जनकपुर जो अब नेपाल में है) से लौट रहे थे तो उनके पग का निशान है। जो देखने योग्य है। हाजीपुर का केला बहुत ही प्रसिद्ध है।

—संकलन: संजय कुमार



फौजी की भर्ती रैली और मैं

कुछ लोग नियति के वश में होते हैं और जैसे-जैसे नियति करवाती है उसके अनुरूप विवशता में वो इंसान वैसा ही करता रहता है। इसके ठीक विपरीत कुछ लोग अपने मुताबिक परिस्थिति को बनाते हैं और जैसा चाहते हैं वैसा करते हैं, नियति इनके वश में होती है। मैं उनमें से हूँ जो नियति के अनुरूप चलते हैं। अगर आप किसी भी तरह से समर्थ या यूँ कहें सक्षम नहीं हैं तो आपको परिस्थिति के अनुसार ही चलना मजबूरी बन जाता है। आप कितना भी कोशिश कर लें चाहकर भी वैसा नहीं कर सकते हैं जैसा आप सोंचते हैं। मेरी भी कहानी कुछ इस तरह ही है...

मैंने फौजी में भर्ती होने के लिए दो बार प्रयास किया लेकिन दोनों ही बार असफल रहा, वजह मेरे कद की ऊँचाई कम आँकी गयी। जब मैं घर पर फीते से नापता तो ठीक उतना पाता जितना फौजी में भर्ती होने के लिए आवश्यक था, यानि 169 सेंटीमीटर। जब भी फौजी में भर्ती होने के लिए जाता वहाँ थोड़ा कम ही मापा जाता था इसके वजह से मैं आज एक फौजी नहीं बन सका, इस बात का मलाल तो है ही लेकिन हाँ, इस बात की तसल्ली है कि अभी मैं एक ग्राफिक डिजानर हूँ और इस पेशे से खुश हूँ, क्योंकि मेरा बचपन से ही कला-संस्कृति में रूझान था, पेंटिंग करना, गाने गाना, कविता, गजल लिखना, इत्यादि। आज मैं उतना कमा लेता हूँ जितने में परिवार चल सके और खुश रह सकें। लेकिन कहते हैं सरकारी नौकरी, सरकारी नौकरी होती है। समाज में एक अलग ही सरकारी नौकरी वाले का रूतबा होता है, सम्मान होता है। जनमानस ऐसा मानता है कि सरकारी नौकरी मिल जाए तो जीवन सँवर जाती है, गाँव के लोग उस व्यक्ति को सम्मान की दृष्टि से देखते हैं। कहावत है- तपस्या करके भगवान को प्राप्त किया जा सकता लेकिन सरकारी नौकरी प्राप्त करना...

मैं पूरे तैयारी के साथ फौजी में भर्ती होने के लिए पटना के मोइन-उल-हक स्टेडियम में फौजी द्वारा आयोजित भर्ती रैली में अपने चचेरे भाई शिवनारायण के साथ गया। साथ में गाँव के एक-दो लड़के में से एक संजय साहनी भी थे, जो आज बिहार पुलिस की नौकरी में कार्यरत हैं। गाँव के नवयुवक में सरकारी नौकरी पाने की जो लालसा होती है उसको शब्दों में बयान करना कठिन है। भर्ती होने के दिन से एक दिन पहले ही रात करीब आठ बजे मैदान में पहुँच गया था। वहीं पर रात भर विश्राम करने के बाद भोर में ही परीक्षण के लिए निकल पड़ा। दौड़, बिम, की तैयारी मैंने पहले से ही कर रखा था, इसलिए किसी भी बात की कोई चिन्ता नहीं थी। सबसे सुना था कि कद की ऊँचाई की जाँच दो बार होती है। पहली प्रवेश द्वार पर ही, और दूसरी दौड़ और बिम जाँच निकालने के बाद। सबने यह भी बताया था कि जहाँ प्रवेश द्वार है वहाँ थोड़ा एड़ियों को उचकाकर जल्दी से निकल जाना, वहाँ पर जल्दी-जल्दी भीड़ में मैदान के अंदर प्रवेश कराया जाता है, तो निकल जाओगे, ठीक उसी तरह मैंने किया। अब बारी है दौड़ने की, मैंने दौड़ लगाया, सभी तेजी से भाग रहे थे, मैं भी उसी भीड़ में दौड़ता रहा लेकिन औरों के अपेक्षा थोड़ा गति कम कर रखा था क्योंकि वहाँ मैदान के चार चक्कर लगाये जाते हैं और पहले ही चक्कर में हाँफ गये तो बाकी के चक्कर लगाना मुश्किल हो जाएगा; ऐसा कुछ अनुभवी लड़कों का सुझाव था। पहली चक्कर पूरी हुई, फिर दूसरी, फिर तीसरी, इतने तक तो हालत खराब होते जा रही थी, लेकिन सरकारी नौकरी पाने की ललक ने दिलों-दिमाग को और भी मजबूत करके दौड़ाता चला गया। आखिरी चक्कर में मैंने अपनी दौड़ बहुत तेज कर दिया, साँस बहुत ही फुल रहे थे, फिर भी साहस करके आखिर मैंने सटिसफैक्टरी (संतोषजनक) में अपना स्थान बना लिया। अब बारी आयी बिम खींचने की जिसमें कम-से-कम 7 बार खींचना अनिवार्य था। मेरी तैयारी तो पूरी पहले से थी ही, तो इसमें भी मैंने अपना स्थान बना लिया। अब हमलोग उस समूह में बैठा दिये गये, जहाँ सभी दौड़ और बिम की जाँच में सफल हो चुके थे। उसी समूह में मेरे एक दोस्त से मुलाकात हो गयी, जो मेरे ही विद्यालय में एक वर्ग आगे के थे। आपस में हमदोनों ने हालचाल पूछा कैसे हो? तो कैसे हो? फिर बहुत देर तक बैठाया गया ताकि आगे के बचे हुए जाँच हो सके। बातचीत के दौरान ही मेरे दोस्त गुनगुनाने लगे- “जाने क्या होगा रामा रे... जाने क्या होगा मौला रे... (फिल्मः काँटे, 2002)।” हाल ही की फिल्म थी इसलिए सबके जुबान पर चढ़ी हुई थी। फिर अगली जाँच फिर से कद ऊँचाई की थी, जो बड़े ही बारीकी से जाँची जा रही थी। कुछएक के बाद मेरी बारी आयी। मैं इस जाँच में असफल हो गया, मेरी कद की ऊँचाई 169 सेंटीमीटर होने के बावजूद भी मुझे छाँट दिया गया। मेरे बहुत ही कहने और गिड़गिड़ाने के बाद कि मुझे दुबारा जाँच लीजिए सर। प्लीज सर। फिर जाँच अधिकारी ने रहम खाकर मुझे दुबारा जाँच की, लेकिन फिर भी मैं असफल रहा। वजह जो रही हो लेकिन इतना तो तय था कि मेरी कद की ऊँचाई 169 सेंटीमीटर थी, जो एक फौजी में भर्ती के लिए अनिवार्य था।

मेरे दोस्त जो गाना गा रहे थे, “जाने क्या होगा रामा रे... जाने क्या होगा मौला रे...”। रामा ने तो उनकी सुन ली और आज वो फौजी की नौकरी पाकर धन्य हो गये और मैं एक डिजानर बन गया। करीब 14 वर्ष के बाद उसी दोस्त से मुलाकात फेसबुक पर हुई। फेसबुक पर देखते ही मैं खुशी से उछल पड़ा और उनसे सम्पर्क साधने का प्रयत्न किया। फिर बात हुई और उनको मैंने फेसबुक के टिप्पणी में वही गाने दोहराया जो उन्होंने उस समय गाये थे। उन्होंने यह कहकर तसल्ली दिलाया कि आप मुझसे ज्यादा खुश हैं, क्योंकि फौजी की नौकरी के बारे में तो आप जानते ही हैं, कि कैसी नौकरी होती है? आज वो मेरे फेसबुक के दोस्तों की सूची में शामिल हैं और समय-समय पर बातचीत भी होते रहती है। उनका नाम - सत्येन्द्र साह, नैनहा है।

कहानी यहीं खत्म नहीं होती है, दूसरी बार जब मैं फौजी भर्ती रैली में गया तो क्या हुआ ? उसके बारे में फिर कभी बताऊंगा। तब तक के लिए नमस्कार!

लेखनः संजय साह

लुढ़कपाँचे

एक पंडितजी शिक्षक थे, उनका दाम्पत्य जीवन बड़ा ही खुशहाल था। उनकी पंडिताईन रोज सुबह उठ के, स्नान आदि करके पंडितजी के लिए दोपहर का भोजन तैयार करतीं और पंडितजी को विद्यालय खुशी-खुशी भेजतीं। उधर पंडितजी को विद्यालय भेजने के बाद पंडिताईन रोज कुछ-न-कुछ नये-नये पकवान बनातीं और खुद बड़े चाव से खातीं। जबतक पंडितजी शाम को विद्यालय से लौटते तबतक सारा पुआ-पकवान चट! और बर्त्तन साफ करके रख देतीं।

एक दिन की बात है, पंडितजी को विद्यालय से किसी कारणवश दोपहर में ही छुट्टी करके घर आना पड़ा। घर पहुँचकर पंडिताईन से पूछा, क्या बात है प्रिये! आज तो रसोईघर से लड्डू की खूश्बू आ रही है। पंडिताईन तो डर गयीं, सोंचने लगी अब क्या बहाना बनाऊँ? आज तो पकड़ी जाऊँगी। फिर झट से उन्होंने कह दिया आज लुढ़कपाँचे है। पंडितजी बोले ये लुढ़कपाँचे क्या होता? ये कौन-सा व्रत है, ये कौन-सा त्योहार है? पंडिताईन बोलीं यह सिर्फ धर्मपत्नीयों के लिए होता है। ये जो लड्डू बने हैं उसको मैं इस टाँड (मचान, छज्जी, घर में लकड़ी के बने होते हैं, जिसपर सामान वगैरह रखा जाता है) पर फेकूंगी और जो लुढ़क के आएगा उसे मैं खाऊँगी। इससे पति की उम्र लम्बी होती है; इसी को लुढ़कपाँचे कहते हैं। पंडितजी बोले ऐसा तो मैंने कोई व्रत-त्योहार नहीं सुना है। फिर मन-ही-मन सोंचने लगे दाल में जरूर कुछ काला है। तबतक इसी बीच पंडिताईन वहाँ से स्नान करने को निकल लीं, यह कहकर कि स्नान के बाद यह व्रत मैं तोडूँगी। फिर पंडितजी भी बोले ठीक है, मैं भी कुछ जरूरी काम से परोस में जा रहा हूँ, आकर के साथ-साथ भोजन करेंगे।

पंडिताईन उधर स्नान को गयीं, तब पंडितजी उस टाँड पर चढ़ गये और चुपके-से दुबक कर पीछे की तरफ चादर ओढ़कर लेट गये। पंडिताईन व्रत तोड़ने के लिए तैयार थीं। अब उन्होंने देवी-देवताओं को स्मरण करके धूप-दीप जलाकर लड्डू फेंकना शुरू कीं। एक लड्डू फेंकी लुढ़ककर नहीं आया, दूसरा लड्डू फेंकी लुढ़ककर नहीं आया। इसी तरह सारे लड्डू फेंक दीं, लुढ़क के एक भी नहीं आया। अब सोंच में पड़ गयीं, क्या हुआ? एक भी लड्डू वापस नहीं आया, तभी एक तरकीब सुझी, घर के दूसरे कमरे से एक नुकीला छोटा बाँस लेकर आयीं और उस टाँड को खोंचकारते हुए हिलाने लगीं। अब पंडितजी जो उसपर बैठे थे, उनके पेट में चुभने लगी, जब बर्दाश्त नहीं हुआ तो बोल पड़े- अरे! पंडिताईन, यह क्या कर रही हो? फिर पंडिताईन चकित होते हुए बोलीं, तो अच्छा! आप थे। तभी तो मैं कहूँ कि यह लड्डू वापस आया क्यों नहीं। पंडितजी बोले आपके लिए लुढ़कपाँचे था, तो मेरे लिए अटकपाँचे था। हमदोनों ने एक-दूसरे के लिए व्रत रखा था। जो अटक गया लड्डू वह मेरा हुआ और यदि लुढ़ककर आ जाता तो आपका होता? आपका व्रत असफल रहा व मेरा सफल हो गया; और फिर पंडितजी जोर-जोर से हँसने लगे। सारे लड्डू में से पंडितजी कुछ खा लिये थे और बाकी पंडिताईन के लिए बचाकर रख लिये थे।

पंडिताईन अपने किये पर शर्मिन्दा हुईं और पंडितजी से माफी माँगी और फिर से ऐसी ग़लती न दोहराने की कसम खायीं। अब, वे दोनों दाम्पत्य जीवन खुशी-खुशी बीताने लगे।

दोस्तों! गाँव में आज नागपंचमी मनाया जा रहा है। आप सभी को नागपंचमी की हार्दिक शुभकामनाएँ! नागपंचमी को बिहार में नगपाँचे या लगपाँचे भी कहते हैं। घर के चारों ओर गोबर के लकीरें खींची जाती हैं। घर के द्वार पर गोबर के पाँच छोटे-छोटे लोई लगायी जाती है और घर के नाग देवता को दूध चढ़ाया जाता है। गाँव में लोग पास के शिवमंदिर में पंडितजी से बालू पढ़वाने जाते हैं और बालू को घर में छिड़क दिया जाता है। घर में खीर-पूड़ी बनाकर लोग नागपंचमी का त्योहार मनाते हैं। जगह-जगह पर नागपंचमी के उपलक्ष्य में मेले का आयोजन होता है जो सप्ताह भर तक चलता है। कुछ इस तरह गाँव के नागपंचमी मनाया जाता है। इसी नागपंचमी से एक व्यंग कथा मुझे याद आया जो बचपन में मैंने अपने विद्यालय में कक्षा करीब चार या पाँच में दीनेश मास्टर साहेब (गाँव के विद्यालय में गुरू को मास्टर साहेब कहते हैं या अब तो सर जी भी कहने लगे हैं) से सुना था। हिन्दी के विशेषज्ञ थे और छात्रों को बड़े प्यार से पढ़ाते थे, चुकि मेरी हिन्दी अच्छी थी, इसलिए मुझे बड़ा ही स्नेह मिलता था उनसे।

संकलनः संजय साह