अस्सी चुटकी नब्बे ताल, खा के खैनी पंखे पर डाल... फिल्मों के गाने जनमानस को ज्यादा ही प्रभावित करते हैं। खैनी, गुटखा खाने वाले लोग तो बड़े ही शान से खाते हैं और गंदगी भी करने में कोई कोताही नहीं बरतते हैं। यह झुठी शान ही हमारे देश के हर सरकारी दफ्तरों के सीढ़ियों, ऐतिहासिक इमारतों, ट्रेनों में लगे पंखे के ऊपर, इत्यादि जगहों को गंदा कर रहा है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्र का नाम बदनाम हो रहा है।
ट्रेनों में सफर के दौरान बीड़ी, सिगरेट, तम्बाकु, जर्दा, गुटखा, लोग ख़ूब खाते हैं और गंदगी भी ख़ूब करते हैं। साफ-सफाई के लिए पूरे भारत में स्वच्छ भारत अभियान भी चलाया जा रहा, लेकिन इन मजदूर वर्गों को समझाना "भैंस के आगे बिन बजाये, भैंस गये पगुराये" के समान है। हाँ, अब तो ट्रेन में मैंने देखा कि कूड़ेदान भी बना दिये गये हैं। फिर भी लोग खैनी खाकर पंखे के ऊपर ही डालते हैं।
इसके लिए आमजन जिम्मेदार तो है ही, साथ-साथ उन सफाई कर्मचारियों की भी लापरवाही है, जो सफाई करने पर ध्यान ही नहीं देते। ये तस्वीरें हकीकत बयान कर रही है कि किस तरह ट्रेन में गंदगी फैली है और लोग सिगरेट के डिब्बे, खैनी के पन्नी किस तरह पंखे के भीतर ठूँस रखा है।
संकलन व लेखन: संजय साह

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