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Friday, July 29, 2016

लुढ़कपाँचे

एक पंडितजी शिक्षक थे, उनका दाम्पत्य जीवन बड़ा ही खुशहाल था। उनकी पंडिताईन रोज सुबह उठ के, स्नान आदि करके पंडितजी के लिए दोपहर का भोजन तैयार करतीं और पंडितजी को विद्यालय खुशी-खुशी भेजतीं। उधर पंडितजी को विद्यालय भेजने के बाद पंडिताईन रोज कुछ-न-कुछ नये-नये पकवान बनातीं और खुद बड़े चाव से खातीं। जबतक पंडितजी शाम को विद्यालय से लौटते तबतक सारा पुआ-पकवान चट! और बर्त्तन साफ करके रख देतीं।

एक दिन की बात है, पंडितजी को विद्यालय से किसी कारणवश दोपहर में ही छुट्टी करके घर आना पड़ा। घर पहुँचकर पंडिताईन से पूछा, क्या बात है प्रिये! आज तो रसोईघर से लड्डू की खूश्बू आ रही है। पंडिताईन तो डर गयीं, सोंचने लगी अब क्या बहाना बनाऊँ? आज तो पकड़ी जाऊँगी। फिर झट से उन्होंने कह दिया आज लुढ़कपाँचे है। पंडितजी बोले ये लुढ़कपाँचे क्या होता? ये कौन-सा व्रत है, ये कौन-सा त्योहार है? पंडिताईन बोलीं यह सिर्फ धर्मपत्नीयों के लिए होता है। ये जो लड्डू बने हैं उसको मैं इस टाँड (मचान, छज्जी, घर में लकड़ी के बने होते हैं, जिसपर सामान वगैरह रखा जाता है) पर फेकूंगी और जो लुढ़क के आएगा उसे मैं खाऊँगी। इससे पति की उम्र लम्बी होती है; इसी को लुढ़कपाँचे कहते हैं। पंडितजी बोले ऐसा तो मैंने कोई व्रत-त्योहार नहीं सुना है। फिर मन-ही-मन सोंचने लगे दाल में जरूर कुछ काला है। तबतक इसी बीच पंडिताईन वहाँ से स्नान करने को निकल लीं, यह कहकर कि स्नान के बाद यह व्रत मैं तोडूँगी। फिर पंडितजी भी बोले ठीक है, मैं भी कुछ जरूरी काम से परोस में जा रहा हूँ, आकर के साथ-साथ भोजन करेंगे।

पंडिताईन उधर स्नान को गयीं, तब पंडितजी उस टाँड पर चढ़ गये और चुपके-से दुबक कर पीछे की तरफ चादर ओढ़कर लेट गये। पंडिताईन व्रत तोड़ने के लिए तैयार थीं। अब उन्होंने देवी-देवताओं को स्मरण करके धूप-दीप जलाकर लड्डू फेंकना शुरू कीं। एक लड्डू फेंकी लुढ़ककर नहीं आया, दूसरा लड्डू फेंकी लुढ़ककर नहीं आया। इसी तरह सारे लड्डू फेंक दीं, लुढ़क के एक भी नहीं आया। अब सोंच में पड़ गयीं, क्या हुआ? एक भी लड्डू वापस नहीं आया, तभी एक तरकीब सुझी, घर के दूसरे कमरे से एक नुकीला छोटा बाँस लेकर आयीं और उस टाँड को खोंचकारते हुए हिलाने लगीं। अब पंडितजी जो उसपर बैठे थे, उनके पेट में चुभने लगी, जब बर्दाश्त नहीं हुआ तो बोल पड़े- अरे! पंडिताईन, यह क्या कर रही हो? फिर पंडिताईन चकित होते हुए बोलीं, तो अच्छा! आप थे। तभी तो मैं कहूँ कि यह लड्डू वापस आया क्यों नहीं। पंडितजी बोले आपके लिए लुढ़कपाँचे था, तो मेरे लिए अटकपाँचे था। हमदोनों ने एक-दूसरे के लिए व्रत रखा था। जो अटक गया लड्डू वह मेरा हुआ और यदि लुढ़ककर आ जाता तो आपका होता? आपका व्रत असफल रहा व मेरा सफल हो गया; और फिर पंडितजी जोर-जोर से हँसने लगे। सारे लड्डू में से पंडितजी कुछ खा लिये थे और बाकी पंडिताईन के लिए बचाकर रख लिये थे।

पंडिताईन अपने किये पर शर्मिन्दा हुईं और पंडितजी से माफी माँगी और फिर से ऐसी ग़लती न दोहराने की कसम खायीं। अब, वे दोनों दाम्पत्य जीवन खुशी-खुशी बीताने लगे।

दोस्तों! गाँव में आज नागपंचमी मनाया जा रहा है। आप सभी को नागपंचमी की हार्दिक शुभकामनाएँ! नागपंचमी को बिहार में नगपाँचे या लगपाँचे भी कहते हैं। घर के चारों ओर गोबर के लकीरें खींची जाती हैं। घर के द्वार पर गोबर के पाँच छोटे-छोटे लोई लगायी जाती है और घर के नाग देवता को दूध चढ़ाया जाता है। गाँव में लोग पास के शिवमंदिर में पंडितजी से बालू पढ़वाने जाते हैं और बालू को घर में छिड़क दिया जाता है। घर में खीर-पूड़ी बनाकर लोग नागपंचमी का त्योहार मनाते हैं। जगह-जगह पर नागपंचमी के उपलक्ष्य में मेले का आयोजन होता है जो सप्ताह भर तक चलता है। कुछ इस तरह गाँव के नागपंचमी मनाया जाता है। इसी नागपंचमी से एक व्यंग कथा मुझे याद आया जो बचपन में मैंने अपने विद्यालय में कक्षा करीब चार या पाँच में दीनेश मास्टर साहेब (गाँव के विद्यालय में गुरू को मास्टर साहेब कहते हैं या अब तो सर जी भी कहने लगे हैं) से सुना था। हिन्दी के विशेषज्ञ थे और छात्रों को बड़े प्यार से पढ़ाते थे, चुकि मेरी हिन्दी अच्छी थी, इसलिए मुझे बड़ा ही स्नेह मिलता था उनसे।

संकलनः संजय साह

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