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Friday, July 29, 2016

फौजी की भर्ती रैली और मैं

कुछ लोग नियति के वश में होते हैं और जैसे-जैसे नियति करवाती है उसके अनुरूप विवशता में वो इंसान वैसा ही करता रहता है। इसके ठीक विपरीत कुछ लोग अपने मुताबिक परिस्थिति को बनाते हैं और जैसा चाहते हैं वैसा करते हैं, नियति इनके वश में होती है। मैं उनमें से हूँ जो नियति के अनुरूप चलते हैं। अगर आप किसी भी तरह से समर्थ या यूँ कहें सक्षम नहीं हैं तो आपको परिस्थिति के अनुसार ही चलना मजबूरी बन जाता है। आप कितना भी कोशिश कर लें चाहकर भी वैसा नहीं कर सकते हैं जैसा आप सोंचते हैं। मेरी भी कहानी कुछ इस तरह ही है...

मैंने फौजी में भर्ती होने के लिए दो बार प्रयास किया लेकिन दोनों ही बार असफल रहा, वजह मेरे कद की ऊँचाई कम आँकी गयी। जब मैं घर पर फीते से नापता तो ठीक उतना पाता जितना फौजी में भर्ती होने के लिए आवश्यक था, यानि 169 सेंटीमीटर। जब भी फौजी में भर्ती होने के लिए जाता वहाँ थोड़ा कम ही मापा जाता था इसके वजह से मैं आज एक फौजी नहीं बन सका, इस बात का मलाल तो है ही लेकिन हाँ, इस बात की तसल्ली है कि अभी मैं एक ग्राफिक डिजानर हूँ और इस पेशे से खुश हूँ, क्योंकि मेरा बचपन से ही कला-संस्कृति में रूझान था, पेंटिंग करना, गाने गाना, कविता, गजल लिखना, इत्यादि। आज मैं उतना कमा लेता हूँ जितने में परिवार चल सके और खुश रह सकें। लेकिन कहते हैं सरकारी नौकरी, सरकारी नौकरी होती है। समाज में एक अलग ही सरकारी नौकरी वाले का रूतबा होता है, सम्मान होता है। जनमानस ऐसा मानता है कि सरकारी नौकरी मिल जाए तो जीवन सँवर जाती है, गाँव के लोग उस व्यक्ति को सम्मान की दृष्टि से देखते हैं। कहावत है- तपस्या करके भगवान को प्राप्त किया जा सकता लेकिन सरकारी नौकरी प्राप्त करना...

मैं पूरे तैयारी के साथ फौजी में भर्ती होने के लिए पटना के मोइन-उल-हक स्टेडियम में फौजी द्वारा आयोजित भर्ती रैली में अपने चचेरे भाई शिवनारायण के साथ गया। साथ में गाँव के एक-दो लड़के में से एक संजय साहनी भी थे, जो आज बिहार पुलिस की नौकरी में कार्यरत हैं। गाँव के नवयुवक में सरकारी नौकरी पाने की जो लालसा होती है उसको शब्दों में बयान करना कठिन है। भर्ती होने के दिन से एक दिन पहले ही रात करीब आठ बजे मैदान में पहुँच गया था। वहीं पर रात भर विश्राम करने के बाद भोर में ही परीक्षण के लिए निकल पड़ा। दौड़, बिम, की तैयारी मैंने पहले से ही कर रखा था, इसलिए किसी भी बात की कोई चिन्ता नहीं थी। सबसे सुना था कि कद की ऊँचाई की जाँच दो बार होती है। पहली प्रवेश द्वार पर ही, और दूसरी दौड़ और बिम जाँच निकालने के बाद। सबने यह भी बताया था कि जहाँ प्रवेश द्वार है वहाँ थोड़ा एड़ियों को उचकाकर जल्दी से निकल जाना, वहाँ पर जल्दी-जल्दी भीड़ में मैदान के अंदर प्रवेश कराया जाता है, तो निकल जाओगे, ठीक उसी तरह मैंने किया। अब बारी है दौड़ने की, मैंने दौड़ लगाया, सभी तेजी से भाग रहे थे, मैं भी उसी भीड़ में दौड़ता रहा लेकिन औरों के अपेक्षा थोड़ा गति कम कर रखा था क्योंकि वहाँ मैदान के चार चक्कर लगाये जाते हैं और पहले ही चक्कर में हाँफ गये तो बाकी के चक्कर लगाना मुश्किल हो जाएगा; ऐसा कुछ अनुभवी लड़कों का सुझाव था। पहली चक्कर पूरी हुई, फिर दूसरी, फिर तीसरी, इतने तक तो हालत खराब होते जा रही थी, लेकिन सरकारी नौकरी पाने की ललक ने दिलों-दिमाग को और भी मजबूत करके दौड़ाता चला गया। आखिरी चक्कर में मैंने अपनी दौड़ बहुत तेज कर दिया, साँस बहुत ही फुल रहे थे, फिर भी साहस करके आखिर मैंने सटिसफैक्टरी (संतोषजनक) में अपना स्थान बना लिया। अब बारी आयी बिम खींचने की जिसमें कम-से-कम 7 बार खींचना अनिवार्य था। मेरी तैयारी तो पूरी पहले से थी ही, तो इसमें भी मैंने अपना स्थान बना लिया। अब हमलोग उस समूह में बैठा दिये गये, जहाँ सभी दौड़ और बिम की जाँच में सफल हो चुके थे। उसी समूह में मेरे एक दोस्त से मुलाकात हो गयी, जो मेरे ही विद्यालय में एक वर्ग आगे के थे। आपस में हमदोनों ने हालचाल पूछा कैसे हो? तो कैसे हो? फिर बहुत देर तक बैठाया गया ताकि आगे के बचे हुए जाँच हो सके। बातचीत के दौरान ही मेरे दोस्त गुनगुनाने लगे- “जाने क्या होगा रामा रे... जाने क्या होगा मौला रे... (फिल्मः काँटे, 2002)।” हाल ही की फिल्म थी इसलिए सबके जुबान पर चढ़ी हुई थी। फिर अगली जाँच फिर से कद ऊँचाई की थी, जो बड़े ही बारीकी से जाँची जा रही थी। कुछएक के बाद मेरी बारी आयी। मैं इस जाँच में असफल हो गया, मेरी कद की ऊँचाई 169 सेंटीमीटर होने के बावजूद भी मुझे छाँट दिया गया। मेरे बहुत ही कहने और गिड़गिड़ाने के बाद कि मुझे दुबारा जाँच लीजिए सर। प्लीज सर। फिर जाँच अधिकारी ने रहम खाकर मुझे दुबारा जाँच की, लेकिन फिर भी मैं असफल रहा। वजह जो रही हो लेकिन इतना तो तय था कि मेरी कद की ऊँचाई 169 सेंटीमीटर थी, जो एक फौजी में भर्ती के लिए अनिवार्य था।

मेरे दोस्त जो गाना गा रहे थे, “जाने क्या होगा रामा रे... जाने क्या होगा मौला रे...”। रामा ने तो उनकी सुन ली और आज वो फौजी की नौकरी पाकर धन्य हो गये और मैं एक डिजानर बन गया। करीब 14 वर्ष के बाद उसी दोस्त से मुलाकात फेसबुक पर हुई। फेसबुक पर देखते ही मैं खुशी से उछल पड़ा और उनसे सम्पर्क साधने का प्रयत्न किया। फिर बात हुई और उनको मैंने फेसबुक के टिप्पणी में वही गाने दोहराया जो उन्होंने उस समय गाये थे। उन्होंने यह कहकर तसल्ली दिलाया कि आप मुझसे ज्यादा खुश हैं, क्योंकि फौजी की नौकरी के बारे में तो आप जानते ही हैं, कि कैसी नौकरी होती है? आज वो मेरे फेसबुक के दोस्तों की सूची में शामिल हैं और समय-समय पर बातचीत भी होते रहती है। उनका नाम - सत्येन्द्र साह, नैनहा है।

कहानी यहीं खत्म नहीं होती है, दूसरी बार जब मैं फौजी भर्ती रैली में गया तो क्या हुआ ? उसके बारे में फिर कभी बताऊंगा। तब तक के लिए नमस्कार!

लेखनः संजय साह

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