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Friday, July 29, 2016

वैशाली

वैशाली जहाँ से सर्वप्रथम प्रजातंत्र शासन प्रणाली का उदय हुआ था। विश्‍व को सर्वप्रथम गणतंत्र का ज्ञान करानेवाला स्‍थान वैशाली ही है। वैशाली का नामाकरण रामायण काल के एक राजा ईक्ष्वाकु वंशीय राजा विशाल के नाम पर हुआ है। वैशाली बिहार राज्य का एक जिला है, जो राज्य की राजधानी पटना से लगभग 45 कि.मी. दूर उत्तर में है। यहाँ पर सम्राट अशोक का अशोक-स्तम्भ है, जिसको भीम की लाठी भी कहा जाता है (देखें: चित्र)। यहाँ सम्राट अशोक का गढ़ भी है। जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर का जन्म इसी जिला में कुंडग्राम नामक स्थान पर हुआ था, जो वैशाली गढ़ से कुछ दूरी पर है। भगवान बुद्ध ने वैशाली के समीप कोल्‍हुआ में अपना अंतिम सम्बोधन दिया था।

वैशाली कि नगरवधु आम्रपाली विश्वप्रसिद्ध राजनर्तकी थी। मगध सम्राट बिंबसार ने आम्रपाली को पाने के लिए वैशाली पर जब आक्रमण किया तब संयोगवश उसकी पहली मुलाकात आम्रपाली से ही हुई। आम्रपाली के रूप-सौंदर्य पर मुग्ध होकर बिंबसार पहली ही नजर में अपना दिल दे बैठे थे। माना जाता है कि आम्रपाली से प्रेरित होकर बिंबसार ने अपने राजदरबार में राजनर्तकी के प्रथा की शुरुआत की थी। बिंबसार को आम्रपाली से एक पुत्र भी हुआ जो बाद में बौद्ध भिक्षु बना।

वैशाली जिला की बात हो और हाजीपुर शहर की चर्चा न हो ऐसा हो हीं नहीं सकता। हाजीपुर के पास से हीं गुजरने वाली गंडक नदी है जिसके एक किनारे हाजीपुर और दूसरे किनारे सोनपुर छोटा शहर बसा हुआ है। जहाँ पर एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला लगता है। यह मेला कार्तिक पूर्णिमा से शुरू होकर एक महीना तक रहता है। जहाँ पर बहुत से विदेशी पर्यटक भी मेला देखने आते हैं। सोनपुर रेलवे मार्ग से भी जुड़ा हुआ है। सोनपुर की रेलवे प्लेटफार्म भारत की तीसरी सबसे बड़ी (लम्बाई में) प्लेटफार्म है।

हाजीपुर से सटा हुआ गंडक नदी के एक किनारे कौनहारा घाट है, जिसके बारे में कहा जाता है, प्राचीन समय में यहाँ गज (हाथी) और ग्राह (मगरमच्छ) में लड़ाई हुई थी। जब हाथी को मगरमच्छ ने घायल करके पानी में डूबोए जा रहा था, तब हाथी ने नदी से कमल का पुष्प तोड़कर, भगवान विष्णु का आराधना किया था और भगवान विष्णु प्रसन्न होकर आए और मगरमच्छ को अपने सुदर्शन चक्र से काटकर हाथी के प्राण की रक्षा की थी। तभी से लोगों द्वारा कहे जाने लगा गज और ग्राह में हुई लड़ाई तो कौन हारा? इसलिए इस घाट को कौनहारा घाट कहते हैं।

इस गंडक नदी के तट पर पैगोडा शैली में निर्मित नेपाली वास्तुकला का एक अद्भुत नमूना देखा जा सकता है, जिसे नेपाली छावनी कहते हैं। शायद दुनिया का एक मात्र ऐसा शिव मंदिर है, जिसके मुंडेर पे कामसूत्र के आसन खुदे हुए हैं। कहते हैं जब वास्तुकार ने इस पवित्र शिव मंदिर पे कामसूत्र के आसन का नक्काशी करके लगाया था तो अंग्रेज सरकार ने उनके हाथ काट लिये थे, ऐसा लोगों का मानना है।

हाजीपुर में ही रामचौरा नामक एक स्थान है, जहाँ पर भगवान रामचंद्र जी जब विवाह करके वापस जनकपुर (जनकपुर जो अब नेपाल में है) से लौट रहे थे तो उनके पग का निशान है। जो देखने योग्य है। हाजीपुर का केला बहुत ही प्रसिद्ध है।

—संकलन: संजय कुमार



फौजी की भर्ती रैली और मैं

कुछ लोग नियति के वश में होते हैं और जैसे-जैसे नियति करवाती है उसके अनुरूप विवशता में वो इंसान वैसा ही करता रहता है। इसके ठीक विपरीत कुछ लोग अपने मुताबिक परिस्थिति को बनाते हैं और जैसा चाहते हैं वैसा करते हैं, नियति इनके वश में होती है। मैं उनमें से हूँ जो नियति के अनुरूप चलते हैं। अगर आप किसी भी तरह से समर्थ या यूँ कहें सक्षम नहीं हैं तो आपको परिस्थिति के अनुसार ही चलना मजबूरी बन जाता है। आप कितना भी कोशिश कर लें चाहकर भी वैसा नहीं कर सकते हैं जैसा आप सोंचते हैं। मेरी भी कहानी कुछ इस तरह ही है...

मैंने फौजी में भर्ती होने के लिए दो बार प्रयास किया लेकिन दोनों ही बार असफल रहा, वजह मेरे कद की ऊँचाई कम आँकी गयी। जब मैं घर पर फीते से नापता तो ठीक उतना पाता जितना फौजी में भर्ती होने के लिए आवश्यक था, यानि 169 सेंटीमीटर। जब भी फौजी में भर्ती होने के लिए जाता वहाँ थोड़ा कम ही मापा जाता था इसके वजह से मैं आज एक फौजी नहीं बन सका, इस बात का मलाल तो है ही लेकिन हाँ, इस बात की तसल्ली है कि अभी मैं एक ग्राफिक डिजानर हूँ और इस पेशे से खुश हूँ, क्योंकि मेरा बचपन से ही कला-संस्कृति में रूझान था, पेंटिंग करना, गाने गाना, कविता, गजल लिखना, इत्यादि। आज मैं उतना कमा लेता हूँ जितने में परिवार चल सके और खुश रह सकें। लेकिन कहते हैं सरकारी नौकरी, सरकारी नौकरी होती है। समाज में एक अलग ही सरकारी नौकरी वाले का रूतबा होता है, सम्मान होता है। जनमानस ऐसा मानता है कि सरकारी नौकरी मिल जाए तो जीवन सँवर जाती है, गाँव के लोग उस व्यक्ति को सम्मान की दृष्टि से देखते हैं। कहावत है- तपस्या करके भगवान को प्राप्त किया जा सकता लेकिन सरकारी नौकरी प्राप्त करना...

मैं पूरे तैयारी के साथ फौजी में भर्ती होने के लिए पटना के मोइन-उल-हक स्टेडियम में फौजी द्वारा आयोजित भर्ती रैली में अपने चचेरे भाई शिवनारायण के साथ गया। साथ में गाँव के एक-दो लड़के में से एक संजय साहनी भी थे, जो आज बिहार पुलिस की नौकरी में कार्यरत हैं। गाँव के नवयुवक में सरकारी नौकरी पाने की जो लालसा होती है उसको शब्दों में बयान करना कठिन है। भर्ती होने के दिन से एक दिन पहले ही रात करीब आठ बजे मैदान में पहुँच गया था। वहीं पर रात भर विश्राम करने के बाद भोर में ही परीक्षण के लिए निकल पड़ा। दौड़, बिम, की तैयारी मैंने पहले से ही कर रखा था, इसलिए किसी भी बात की कोई चिन्ता नहीं थी। सबसे सुना था कि कद की ऊँचाई की जाँच दो बार होती है। पहली प्रवेश द्वार पर ही, और दूसरी दौड़ और बिम जाँच निकालने के बाद। सबने यह भी बताया था कि जहाँ प्रवेश द्वार है वहाँ थोड़ा एड़ियों को उचकाकर जल्दी से निकल जाना, वहाँ पर जल्दी-जल्दी भीड़ में मैदान के अंदर प्रवेश कराया जाता है, तो निकल जाओगे, ठीक उसी तरह मैंने किया। अब बारी है दौड़ने की, मैंने दौड़ लगाया, सभी तेजी से भाग रहे थे, मैं भी उसी भीड़ में दौड़ता रहा लेकिन औरों के अपेक्षा थोड़ा गति कम कर रखा था क्योंकि वहाँ मैदान के चार चक्कर लगाये जाते हैं और पहले ही चक्कर में हाँफ गये तो बाकी के चक्कर लगाना मुश्किल हो जाएगा; ऐसा कुछ अनुभवी लड़कों का सुझाव था। पहली चक्कर पूरी हुई, फिर दूसरी, फिर तीसरी, इतने तक तो हालत खराब होते जा रही थी, लेकिन सरकारी नौकरी पाने की ललक ने दिलों-दिमाग को और भी मजबूत करके दौड़ाता चला गया। आखिरी चक्कर में मैंने अपनी दौड़ बहुत तेज कर दिया, साँस बहुत ही फुल रहे थे, फिर भी साहस करके आखिर मैंने सटिसफैक्टरी (संतोषजनक) में अपना स्थान बना लिया। अब बारी आयी बिम खींचने की जिसमें कम-से-कम 7 बार खींचना अनिवार्य था। मेरी तैयारी तो पूरी पहले से थी ही, तो इसमें भी मैंने अपना स्थान बना लिया। अब हमलोग उस समूह में बैठा दिये गये, जहाँ सभी दौड़ और बिम की जाँच में सफल हो चुके थे। उसी समूह में मेरे एक दोस्त से मुलाकात हो गयी, जो मेरे ही विद्यालय में एक वर्ग आगे के थे। आपस में हमदोनों ने हालचाल पूछा कैसे हो? तो कैसे हो? फिर बहुत देर तक बैठाया गया ताकि आगे के बचे हुए जाँच हो सके। बातचीत के दौरान ही मेरे दोस्त गुनगुनाने लगे- “जाने क्या होगा रामा रे... जाने क्या होगा मौला रे... (फिल्मः काँटे, 2002)।” हाल ही की फिल्म थी इसलिए सबके जुबान पर चढ़ी हुई थी। फिर अगली जाँच फिर से कद ऊँचाई की थी, जो बड़े ही बारीकी से जाँची जा रही थी। कुछएक के बाद मेरी बारी आयी। मैं इस जाँच में असफल हो गया, मेरी कद की ऊँचाई 169 सेंटीमीटर होने के बावजूद भी मुझे छाँट दिया गया। मेरे बहुत ही कहने और गिड़गिड़ाने के बाद कि मुझे दुबारा जाँच लीजिए सर। प्लीज सर। फिर जाँच अधिकारी ने रहम खाकर मुझे दुबारा जाँच की, लेकिन फिर भी मैं असफल रहा। वजह जो रही हो लेकिन इतना तो तय था कि मेरी कद की ऊँचाई 169 सेंटीमीटर थी, जो एक फौजी में भर्ती के लिए अनिवार्य था।

मेरे दोस्त जो गाना गा रहे थे, “जाने क्या होगा रामा रे... जाने क्या होगा मौला रे...”। रामा ने तो उनकी सुन ली और आज वो फौजी की नौकरी पाकर धन्य हो गये और मैं एक डिजानर बन गया। करीब 14 वर्ष के बाद उसी दोस्त से मुलाकात फेसबुक पर हुई। फेसबुक पर देखते ही मैं खुशी से उछल पड़ा और उनसे सम्पर्क साधने का प्रयत्न किया। फिर बात हुई और उनको मैंने फेसबुक के टिप्पणी में वही गाने दोहराया जो उन्होंने उस समय गाये थे। उन्होंने यह कहकर तसल्ली दिलाया कि आप मुझसे ज्यादा खुश हैं, क्योंकि फौजी की नौकरी के बारे में तो आप जानते ही हैं, कि कैसी नौकरी होती है? आज वो मेरे फेसबुक के दोस्तों की सूची में शामिल हैं और समय-समय पर बातचीत भी होते रहती है। उनका नाम - सत्येन्द्र साह, नैनहा है।

कहानी यहीं खत्म नहीं होती है, दूसरी बार जब मैं फौजी भर्ती रैली में गया तो क्या हुआ ? उसके बारे में फिर कभी बताऊंगा। तब तक के लिए नमस्कार!

लेखनः संजय साह

लुढ़कपाँचे

एक पंडितजी शिक्षक थे, उनका दाम्पत्य जीवन बड़ा ही खुशहाल था। उनकी पंडिताईन रोज सुबह उठ के, स्नान आदि करके पंडितजी के लिए दोपहर का भोजन तैयार करतीं और पंडितजी को विद्यालय खुशी-खुशी भेजतीं। उधर पंडितजी को विद्यालय भेजने के बाद पंडिताईन रोज कुछ-न-कुछ नये-नये पकवान बनातीं और खुद बड़े चाव से खातीं। जबतक पंडितजी शाम को विद्यालय से लौटते तबतक सारा पुआ-पकवान चट! और बर्त्तन साफ करके रख देतीं।

एक दिन की बात है, पंडितजी को विद्यालय से किसी कारणवश दोपहर में ही छुट्टी करके घर आना पड़ा। घर पहुँचकर पंडिताईन से पूछा, क्या बात है प्रिये! आज तो रसोईघर से लड्डू की खूश्बू आ रही है। पंडिताईन तो डर गयीं, सोंचने लगी अब क्या बहाना बनाऊँ? आज तो पकड़ी जाऊँगी। फिर झट से उन्होंने कह दिया आज लुढ़कपाँचे है। पंडितजी बोले ये लुढ़कपाँचे क्या होता? ये कौन-सा व्रत है, ये कौन-सा त्योहार है? पंडिताईन बोलीं यह सिर्फ धर्मपत्नीयों के लिए होता है। ये जो लड्डू बने हैं उसको मैं इस टाँड (मचान, छज्जी, घर में लकड़ी के बने होते हैं, जिसपर सामान वगैरह रखा जाता है) पर फेकूंगी और जो लुढ़क के आएगा उसे मैं खाऊँगी। इससे पति की उम्र लम्बी होती है; इसी को लुढ़कपाँचे कहते हैं। पंडितजी बोले ऐसा तो मैंने कोई व्रत-त्योहार नहीं सुना है। फिर मन-ही-मन सोंचने लगे दाल में जरूर कुछ काला है। तबतक इसी बीच पंडिताईन वहाँ से स्नान करने को निकल लीं, यह कहकर कि स्नान के बाद यह व्रत मैं तोडूँगी। फिर पंडितजी भी बोले ठीक है, मैं भी कुछ जरूरी काम से परोस में जा रहा हूँ, आकर के साथ-साथ भोजन करेंगे।

पंडिताईन उधर स्नान को गयीं, तब पंडितजी उस टाँड पर चढ़ गये और चुपके-से दुबक कर पीछे की तरफ चादर ओढ़कर लेट गये। पंडिताईन व्रत तोड़ने के लिए तैयार थीं। अब उन्होंने देवी-देवताओं को स्मरण करके धूप-दीप जलाकर लड्डू फेंकना शुरू कीं। एक लड्डू फेंकी लुढ़ककर नहीं आया, दूसरा लड्डू फेंकी लुढ़ककर नहीं आया। इसी तरह सारे लड्डू फेंक दीं, लुढ़क के एक भी नहीं आया। अब सोंच में पड़ गयीं, क्या हुआ? एक भी लड्डू वापस नहीं आया, तभी एक तरकीब सुझी, घर के दूसरे कमरे से एक नुकीला छोटा बाँस लेकर आयीं और उस टाँड को खोंचकारते हुए हिलाने लगीं। अब पंडितजी जो उसपर बैठे थे, उनके पेट में चुभने लगी, जब बर्दाश्त नहीं हुआ तो बोल पड़े- अरे! पंडिताईन, यह क्या कर रही हो? फिर पंडिताईन चकित होते हुए बोलीं, तो अच्छा! आप थे। तभी तो मैं कहूँ कि यह लड्डू वापस आया क्यों नहीं। पंडितजी बोले आपके लिए लुढ़कपाँचे था, तो मेरे लिए अटकपाँचे था। हमदोनों ने एक-दूसरे के लिए व्रत रखा था। जो अटक गया लड्डू वह मेरा हुआ और यदि लुढ़ककर आ जाता तो आपका होता? आपका व्रत असफल रहा व मेरा सफल हो गया; और फिर पंडितजी जोर-जोर से हँसने लगे। सारे लड्डू में से पंडितजी कुछ खा लिये थे और बाकी पंडिताईन के लिए बचाकर रख लिये थे।

पंडिताईन अपने किये पर शर्मिन्दा हुईं और पंडितजी से माफी माँगी और फिर से ऐसी ग़लती न दोहराने की कसम खायीं। अब, वे दोनों दाम्पत्य जीवन खुशी-खुशी बीताने लगे।

दोस्तों! गाँव में आज नागपंचमी मनाया जा रहा है। आप सभी को नागपंचमी की हार्दिक शुभकामनाएँ! नागपंचमी को बिहार में नगपाँचे या लगपाँचे भी कहते हैं। घर के चारों ओर गोबर के लकीरें खींची जाती हैं। घर के द्वार पर गोबर के पाँच छोटे-छोटे लोई लगायी जाती है और घर के नाग देवता को दूध चढ़ाया जाता है। गाँव में लोग पास के शिवमंदिर में पंडितजी से बालू पढ़वाने जाते हैं और बालू को घर में छिड़क दिया जाता है। घर में खीर-पूड़ी बनाकर लोग नागपंचमी का त्योहार मनाते हैं। जगह-जगह पर नागपंचमी के उपलक्ष्य में मेले का आयोजन होता है जो सप्ताह भर तक चलता है। कुछ इस तरह गाँव के नागपंचमी मनाया जाता है। इसी नागपंचमी से एक व्यंग कथा मुझे याद आया जो बचपन में मैंने अपने विद्यालय में कक्षा करीब चार या पाँच में दीनेश मास्टर साहेब (गाँव के विद्यालय में गुरू को मास्टर साहेब कहते हैं या अब तो सर जी भी कहने लगे हैं) से सुना था। हिन्दी के विशेषज्ञ थे और छात्रों को बड़े प्यार से पढ़ाते थे, चुकि मेरी हिन्दी अच्छी थी, इसलिए मुझे बड़ा ही स्नेह मिलता था उनसे।

संकलनः संजय साह