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Wednesday, September 21, 2016

अस्सी चुटकी नब्बे ताल, खा के खैनी पंखे पर डाल...

अस्सी चुटकी नब्बे ताल, खा के खैनी पंखे पर डाल... फिल्मों के गाने जनमानस को ज्यादा ही प्रभावित करते हैं। खैनी, गुटखा खाने वाले लोग तो बड़े ही शान से खाते हैं और गंदगी भी करने में कोई कोताही नहीं बरतते हैं। यह झुठी शान ही हमारे देश के हर सरकारी दफ्तरों के सीढ़ियों, ऐतिहासिक इमारतों, ट्रेनों में लगे पंखे के ऊपर, इत्यादि जगहों को गंदा कर रहा है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्र का नाम बदनाम हो रहा है।

गाड़ी संख्या 13257-58/जनसाधारण एक्सप्रेस, नाम सुनने से ही मालूम पड़ता है कि किस वर्ग के लोग इन ट्रेनों में सफर करते हैं। इस ट्रेन की एक खासियत यह भी है कि इनमें सभी डिब्बे साधारण बोले तो बैठकर सफर करने वाले हैं। अगर शयनयान श्रेणी में जगह न मिले तो यह ट्रेन एक बेहतर विकल्प है, जिसमें मजबूरी में निम्न वर्ग के लोग से लेकर आला अधिकारी भी सफर करते हैं। मुझे भी तत्काल टिकट सम्पुष्ट न होने पर एक सप्ताह पहले इस ट्रेन में सफर करने का मौका मिला। आनंदविहार में मैं ऊपर के शायिका पर बैठ गया, ट्रेन का डिब्बा इतना भरा हुआ था कि आराम से लोग बैठे हुए थे; और मैं भी रात में पूरे इत्मीनान से सोकर सफर किया और साधारण किराया में शयनयान श्रेणी का आनंद उठाया। हाँ, भले ही गद्दीदार शायिका नहीं थी लेकिन सोकर के जाना ही मेरे लिए काफी था। 

ट्रेनों में सफर के दौरान बीड़ी, सिगरेट, तम्बाकु, जर्दा, गुटखा, लोग ख़ूब खाते हैं और गंदगी भी ख़ूब करते हैं। साफ-सफाई के लिए पूरे भारत में स्वच्छ भारत अभियान भी चलाया जा रहा, लेकिन इन मजदूर वर्गों को समझाना "भैंस के आगे बिन बजाये, भैंस गये पगुराये" के समान है। हाँ, अब तो ट्रेन में मैंने देखा कि कूड़ेदान भी बना दिये गये हैं। फिर भी लोग खैनी खाकर पंखे के ऊपर ही डालते हैं।

इसके लिए आमजन जिम्मेदार तो है ही, साथ-साथ उन सफाई कर्मचारियों की भी लापरवाही है, जो सफाई करने पर ध्यान ही नहीं देते। ये तस्वीरें हकीकत बयान कर रही है कि किस तरह ट्रेन में गंदगी फैली है और लोग सिगरेट के डिब्बे, खैनी के पन्नी किस तरह पंखे के भीतर ठूँस रखा है।

संकलन व लेखन: संजय साह



Wednesday, September 7, 2016

मेरे ग़ज़ल

तेरे प्यार में इस तरह पागल हूँ मैं
कि तेरे नज़रों के तीर का घायल हूँ मैं

इस कदर दीवाने हैं, हम तेरे हुस्न का
इन गोरे-गोरे पैरों का पायल हूँ मैं

तेरी आँखों का नूर, मुझसे ही तो है
जो लगे आँखों में काज़ल हूँ मैं

बहार लाती है फ़ि‍ज़ाओं में जो सावन
वही सावन का बादल हूँ मैं

आजमाँ के तो देख, ऐ मेरे सनम
तेरे इस प्यार के, कायल हूँ मैं

रचनाकारः संजय साह


शब्दार्थ:— नूर (प्रकाश, चमक); फ़ि‍ज़ाओं (वातावरण); कायल (सहमत, यकीन दिलाना)