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Thursday, January 7, 2016

मेरे ग़ज़ल

मुद्दतों बाद आशियाना बनाया था
एक  झोंके में ही उजड़ गया, मेरा न ठिकाना था
लोगों ने जुर्म किये, किस्मत का बहाना था
किस्मत को भी शायद, हम हीं को आजमाना था
अपने आशियाने को चाँद-तारों से सजाना था
ये उसको मंजूर नहीं था, क्योंकि बेरहम जमाना था

रचनाकारः संजय साह


शब्दार्थ:— मुद्दत (बहुत साल, लम्बे समय); आशियाना (घर)

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