मुद्दतों बाद आशियाना बनाया था
एक झोंके में ही उजड़ गया, मेरा न ठिकाना था
लोगों ने जुर्म किये, किस्मत का बहाना था
किस्मत को भी शायद, हम हीं को आजमाना था
अपने आशियाने को चाँद-तारों से सजाना था
ये उसको मंजूर नहीं था, क्योंकि बेरहम जमाना था
रचनाकारः
संजय साह
शब्दार्थ:— मुद्दत (बहुत साल, लम्बे समय); आशियाना (घर)