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Thursday, January 7, 2016

मेरे ग़ज़ल

मुद्दतों बाद आशियाना बनाया था
एक  झोंके में ही उजड़ गया, मेरा ठिकाना था
लोगों ने जुर्म किये, किस्मत का बहाना था
किस्मत को भी शायद, हम हीं को आजमाना था
अपने आशियाने को चाँद-तारों से सजाना था
ये उसको मंजूर नहीं था, क्योंकि बेरहम जमाना था

रचनाकारः संजय साह


शब्दार्थ:— मुद्दत (बहुत साल, लम्बे समय); आशियाना (घर)

कविताएँ

जब चाँद सँवरकर बाम-ए-फलक पर, मह-ए-तबस्सुम होता है।
जब होठों पर जलपरियों के हल्का-सा तरन्नुम होता है।
जब रात सुनाया करती है, रंगीन सितारों के नग्मे,
तो मैं पहरों सोंचा करता हूँ, क्या इसको मोहब्बत कहते हैं।













शब्दार्थ:— बाम-ए-फलक (आसमान का छत); मह-ए-तबस्सुम (चाँद-सा मुस्कान); तरन्नुम (मधुर संगीत)

जिंदगी हर रोज़

दोस्तों! ज़िन्दगी हर रोज़ में हर हफ्ते मैं आपके लिए लेकर आता हूँ; एक नयी घटना जो रोजमर्रा के जिंदगी में हम रोज देखते और जीते हैं।