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Sunday, January 22, 2017

ऐहसान, कुछ पल की दोस्‍ती व अविस्मरणीय यादें

विमुद्रीकरण की वजह से नगद रूपयों को लेकर आमजन को बहुत परेशानियों का सामना करना पड़ा। खासकर उन ग्रामिण क्षेत्रों में जहाँ बिल्‍कुल ही नहीं कोई पेटीएम चलता है और नहीं ऑनलाइन बैंकिंग जैसी कोई सेवा है। इन परिस्थितियों में रोजमर्रा की जिन्‍दगी कठिनाइयों को झेलते हुए गुजरती है, तथापि कुछ भले लोग मिल जाते हैं जो इन परिस्थितियों में भी भलाई करने में हिचकिचाते नहीं। मैं बात कर रहा हूँ— मैकलौड़गंज से लौटते वक्‍त हमारी किराये की गाड़ी (स्‍कॉरपियो) नहरैन पोखर, जिला - काँगरा, हिमाचल प्रदेश में खराब हो गयी थी; दिन के करीब ढाई बजे थे, नजदीक के दुकान से पता करने पर स्‍थानीय मिस्‍त्री का फोन नम्‍बर मिला। फोन करने के करीब १ घण्‍टे बाद मिस्‍त्री आया। मिस्‍त्री गाड़ी को देखने के बाद बताया, गाड़ी को पीछे वापस उसके रिपेरिंग शॉप पर ले जाना पड़ेगा, जहाँ से हमलोग १० मिनट पहले ही गुजरे थे। दिन के करीब साढ़े तीन बज चुके थे, मिस्‍त्री ने गाड़ी को खोलना शुरू किया। उस्‍ताद जी पहले से ही एक गाड़ी बनाने में लगे हुए थे, कभी उस गाड़ी को देखते, तो कभी हमारी गाड़ी यानि दोनों गाड़ी को बारी-बारी से देखते हुए, उन्‍होंने शाम के करीब सवा सात बजे बताया कि गाड़ी में बहुत बड़ी खराबी हो गयी है; इसके पार्ट्स नजदीक के किसी भी दुकान में नहीं मिलने वाले हैं; इसके लिए हमलोगों को रात भर रूकना पड़ेगा, सुबह होने के बाद ही कोई उपाय किया जाएगा। दिसम्‍बर का महिना ठण्ड कुछ खास नहीं थी, लेकिन ठण्डी हवाएँ चलने के कारण सर्दी महसूस हो रही थी। हमलोग कैसे भी करके उसी दिन वापस आना चाहते थे। अगर समय से मिस्‍त्री गाड़ी खोलकर हमें बता देता तो हमलोग वहाँ से करीब ६० किलोमीटर दूर जाकर बाजार से पार्ट्स ले आते, लेकिन लाख मिन्‍नतें करने के बाद भी मिस्‍त्री ने नहीं माना। मिस्‍त्री भी दिनभर का थका-हारा घर जाने को बेचैन हो रहे थे। हम सबने तय किया कि कुल सात लड़कों में से चार या पाँच लड़के दिल्‍ली के लिए बस से रवाना हो जाते हैं। फिर, सागर ने मना कर दिया, कहने का भाव था; मैं इन परिस्थितियों में छोड़कर नहीं जाऊँगा, सागर के मना करते ही सबने मना कर दिया कि हम भी दिल्‍ली नहीं जा रहे हैं। दफ्तर में मुझे अति आवश्‍यक काम के लिए कल पहुँचना बहुत जरूरी था। मैं इसी ऊहापोह में था कि दफ्तर के प्रबन्‍धक को कल पहुँचने का इकरार भी कर चुका हूँ और इनलोगों को छोड़कर चला जाता हूँ तो ये लोग क्‍या कहेंगे कि मुसीबत में साथ छोड़कर चला गया, लेकिन मैंने इस बात से मन को मना लिया कि मात्र मेरे छोड़कर बाकी सारे लड़के यहाँ तो है हीं और ऐसे भी कोई बहुत बड़ी मुसीबत नहीं है; कल सुबह गाड़ी बनवाकर आ ही जाएँगे। फिर, अंकुर से विचार-विमर्श करके मैंने तय किया कि बस से दिल्‍ली के लिए रवाना हो जाता हूँ। मेरे बटुए में मात्र २१० रूपये ही थे, और यहाँ से दिल्‍ली तक का बस किराया करीब ४५० सौ रूपये थे। मैंने अंकुर से २५० सौ रूपये मांगे, लेकिन उसने मना कर दिया। मैं मजबूरी को समझ रहा था, क्‍योंकि गाड़ी को ठीक करने के लिए तथा पार्ट्स खरीदने के लिए मोटी रकम यानि १० से १२ हजार रूपये की जरूरत थी। अंकुर ने तकरीबन २ हजार रूपये नगद पास के ही पेट्रोल पम्‍प से डेबिट कार्ड से भुगतान करके ले लिया था। सबने अपने-अपने नगद रूपये जमा किये तो करीब ७ हजार रूपये ही इकट्ठा हो पाये थे। अंकुर ने सुझाव दिया कि यहाँ से चण्डीगढ़ (पंजाब) तक के लिए टिकट ले लीजिएगा और वहाँ से बस स्‍टैण्‍ड में उतरने के बाद एटीएम से पैसे निकालकर, फिर दूसरी बस पकड़ के दिल्‍ली चले जाइएगा। लेकिन विमुद्रीकरण को लेकर एटीएम की हालत तो... मैं मन-ही-मन यह भी सोंच रहा था कि अगर एटीएम से वहाँ पैसे न निकले, तब क्‍या होगा? मैंने हिम्‍मत जुटाकर वहाँ से निकल पड़ा, सोंचा जो भी होगा देखा जाएगा... मैंने सबसे हाथ मिलाया और बुरा न मानने के लिए कहते हुए अंकुर से नहरैन पोखर के चौराहे तक साथ चलने के लिए कहा— अंकुर ने मना कर दिया।

मैं अकेले ही बस स्‍टैण्‍ड की ओर चल पड़ा। चौराहे पर जाकर खड़ा हो गया, कुछ यात्री खड़े थे जो चण्‍डीगढ़ से आये थे, पूछने से पता चला सामने दूसरी तरफ से दिल्‍ली तक के लिए बस मिल जाएँगे। रात के करीब ९ बज चुके थे। एक बस आयी जो बिल्‍कुल ही नजदीक पहुँचने पर, रोकने के लिए मैंने इशारा किया, बस नहीं रूकी; मैं समझ गया कि बस दूर रहे तभी इशारा करना पड़ेगा। फिर, मैं दूसरी बस का इन्‍तजार करने लगा। अबकी दफा दूसरी बस दूर ही थी कि मैंने रोकने का इशारा किया, बस रूकी और बस में सवार हो गया। उपचालक (कण्‍डक्‍टर) ने टिकट बनवाने को कहा— मैंने उससे दिल्‍ली तक के लिए टिकट बनाने को कहा और बोला मेरे पास मात्र २०० सौ रूपये हैं और बाकी के रूपये पेटीएम या डेबिट कार्ड से लेने के लिए कहा, लेकिन उपचालक ने नहीं माना और उसने दिल्‍ली तक जाने के लिए मना कर दिया। डेबिट कार्ड तथा पेटीएम की सुविधा उपलब्‍ध नहीं है और बोला ५ रूपये का टिकट लो, आगे उतर जाना और उधर से फिर वापस आ जाना। शायद, उसने ऐसा इसलिए कहा होगा कि उसको लगा होगा, मैं वहाँ के स्‍थानीय निवासी हूँ। मैंने कहा— मैं दिल्‍ली में ही रहता हूँ और जॉब करता हूँ; तो उसने पूछा— दिल्‍ली में कहाँ रहते हो? मैंने मुखर्जी नगर बताया; फिर उसने पूछा— मुखर्जीनगर में कहाँ? मैंने कहा— वजीरावाद। इतना पूछने के बाद उसने कहा— चण्‍डीगढ़ तक के लिए टिकट ले लो और वहाँ से ए‍टीएम से पैसे निकालकर दूसरी बस पकड़ लेना, वहाँ से हर दो मिनट पर दिल्‍ली तक के लिए बस चलती है। मैंने कहा— दिल्‍ली पहुँचने पर आपको बाकी के पैसे मिल जाएँगे, फिर भी वह नहीं मान रहा था। मैंने अपने भाई को फोन मिलाया, सम्‍पर्क साधने का प्रयास किया, लेकिन रिलायंस जियो नम्‍बर होने के कारण आवाज़ साफ़ नहीं आ रही थी। बात करने के दौरान ही उपचालक से मैंने पूछा आप कश्‍मीरी गेट होते हुए जाएँगे न! तो उसने हाँ कहा; फिर, विनय से मैंने कहा— तुम कश्‍मीरी गेट पर २५० सौ रूपये लेकर खड़ा रहना। विनय भी मना करने लगा कि मेरे पास नगद रूपये नहीं है। मैंने कहा— मकान मालिक से लेकर तुम आ जाना, लेकिन आवाज़ साफ़ न होने के कारण विनय से भी सम्‍पर्क टूट गया। बस में बैठे बगल के यात्री ने कहा— कण्‍डक्‍टर को अपने भाई से बात करा दो; तबतक विनय से सम्‍पर्क टूट चुका था और मैं झूठमूठ के हाँ, ठीक है आ जाना... इस तरह फोन पर बातें करता रहा ताकि उपचालक को यकिन हो जाए कि मेरा भाई पैसे लेकर खड़ा रहेगा। इतना सबकुछ होने के बाद और काफी मिन्‍नतें करने पर भी उपचालक ने नहीं माना। बस में बैठे सभी यात्री चुपचाप सुन रहे थे, लेकिन किसी ने भी मदद करने की सिफारिश उपचालक से नहीं की। अंतत: मैंने कहा— आप चण्‍डीगढ़ तक के लिए ही टिकट बना दीजिए, आगे जो होगा देख लेंगे। उन्‍होंने १९० रूपये का टिकट बना दिया और बोला कोई टिकट जाँच अधिकारी आता है तो बोलना फलाने जगह पर मैं चढ़ा हूँ। उपचालक ने भी थोड़ा रहम दिखाया क्‍योंकि जहाँ से मैं चढ़ा था, वहाँ से चण्‍डीगढ़ तक का २१० रूपये का टिकट था। अब मेरे बटुए में शेष २० रूपये रह गये थे। करीब आधे घण्टे बाद एक ढाबे पर बस रूकी। ढाबे वाले सभी यात्री से भोजन करने के लिए आवाज़ लगा रहा था— “यहाँ बस २० मिनट रूकेगी, आइए, आइए, भोजन कीजिए...” मैं बस में बैठा सो रहा था, मेरी आँखें खुली, सोंचा पैसे तो है नहीं, क्‍या खाएँ? फिर एक मन हुआ उतर के देखते हैं, शायद कोई उपाय हो जाए। उतरकर ढाबे के अंदर गया, बायरा (वेटर) ने आदर भाव से स्‍वागत किया। मैंने पूछा— आप पेमेंट कैसे लेते हैं? उसने कहा, केवल नगद लेते हैं। मैंने कहा— भाई! मेरे पास पैसे नहीं है। आप चाहें तो पेटीएम या डेबिट कार्ड से पेमेंट ले सकते हैं। मुझे दिल्‍ली तक जाना है और जो पैसे थे, उससे मैंने चण्‍डीगढ़ तक के लिए टिकट ले लिया है, आगे कैसे जाऊँगा भगवान् जाने। मेरे पास मात्र २० रूपये बचे हैं, ऐसा मैंने कहा। लेकिन, बायरा ने बड़े ही प्रेम-भाव से कहा— आप पहले खाना खाइए, फिर पेमेंट के बारे में सोंचेंगे। मैंने मना किया, कहा— भाई मैं ऐसे खाना नहीं खाऊँगा, पहले कोई उपाय बताइए। उसने कहा— भाई साहब! पहले आप खाना खाइए, आप मुझे भाई के समान समझते हैं न! मैंने कहा— हाँ, भाई! बिलकुल। तो फिर आप खाना खाइए, फिर सोंचते हैं भुगतान के बारे में, बायरा ने विनम्रतापूर्वक कहा। मैं कुर्सी पर बैठ गया, कुछ ही पल में ध्‍यान आया कि बस से बैग लाकर मोबाइल चार्ज कर लेते हैं। जबतक खाना खाएँगे, तबतक मोबाइल चार्ज हो जाएगा। मैंने मोबाइल चार्ज के लिए लगा दिया। बायरा ने आकर पूछा— आप क्‍या खाएँगे? मैंने छोले-चावल लाने को कहा; दो मिनट बाद ही छोले-चावल लाकर बायरा ने परोस दिया। सुबह का नास्‍ता किया हुआ, अब जा के पेटभर खाना खाया। खाने के बाद मोबाइल से इंटरनेट चलाने का प्रयत्‍न किया, लेकिन रिलायंस का नेटवर्क होने के कारण स्‍पीड अच्‍छी नहीं थी, इसलिए कुछ भी नहीं कर पाया। अब मैं पेमेंट काउंटर पर गया, बोला भाई! कितने रूपये हुए? इसी बीच बायरा ने खजांची (कैशियर) से कहा— भाई, इनको दिल्‍ली तक जाना है और... मेरी सारी बातें उस बायरा ने बताया। उस कैशियर ने सौ-सौ के तीन और एक पचास का नोट यानि साढ़े तीन सौ रूपये दिये। मेरे चेहरे पर थोड़ी खुशी के भाव झलकने लगे। मैंने पूछा— खाने के कितने रूपये हुए। उनका जबाव था; कोई बात नहीं, आप रहने दीजिए। मैंने कहा— ऐसे कैसे कोई बात नहीं, आपने मेरे ऊपर उपकार किया है और मैं ऐसे ही आपका पैसा नहीं ले सकता। आपको मैं दिल्‍ली पहुँचते ही ऑनलाइन पेमेंट कर दूँगा। आप अपने बैंक का खाता संख्‍या दीजिए। वो खाता संख्‍या भी देने के लिए राजी नहीं हो रहे थे। मैंने दोबारा उनसे कहा, मेरे सहज भाव को देखकर, बायरा ने खजांची को अपना खाता संख्‍या देने को कहा। फिर, कैशियर ने बायरा को कहा, इस तरह १५ से २० सेकण्‍ड तक चलता रहा। फिर, वेटर ने अपना पंजाब नेशनल बैंक का खाता संख्‍या एक छोटी-सी काग़ज पर लिखकर दिया। मैंने कहा— मैं अभी के अभी ऑनलाइन रूपये ट्रांस्फर कर दे रहा हूँ। आरबीएल बैंक के ऐप्‍प से मैं तुरंत ही पैसे ट्रांस्फर कर देता, लेकिन नेट की स्‍पीड तेज न होने के कारण निराशा ही हाथ लगी। मेरी बस खुलने ही वाली थी, फिर झट से, मैंने उन दोनों के नाम व कैशियर का मोबाइल नम्‍बर, वहाँ का पता और बैंक किस शाखा में है का पता ले लिया। दौड़कर आया और बस में बैठ गया। मैं खुश था कि पैसे का इन्तजाम हो गया... मेरे सीट के बगल में एक अंकल जी बैठे थे, जिन्‍होंने सारी बातें पूछी। मैंने सारे वाकया उनको सुनाया। फिर, बस में बैठे-बैठे ही उस ढाबे का नाम देखा— साइनबोर्ड पर लिखा था, “गौतम वैष्‍णों ढाबा”। मैंने अपने मोबाइल में उस ढाबे का नाम लिख लिया और उनके मोबाइल नम्‍बर मिलाने का प्रयत्‍न किया, लेकिन मोबाइल स्‍वीच ऑफ बता रहा था। बस खुल गयी और उस अंकल जी से बातें होने लगी। उन्‍होंने कहा— उपचालक को बता दो कि चण्‍डीगढ़ आने के बाद वहाँ से आगे दिल्‍ली तक का टिकट बना देंगे, फिर, मैंने उपचालक से ऐसा कहा। उपचालक भी हैरान हो गया और बोला— उस समय तो रूपये नहीं है की बातें कर रहा था और अब रूपये कहाँ से आ गये? उसने पूछा— पैसे कहाँ से आये, मैंने सारी बातें बतायी। फिर, उपचालक अपनी पुरानी किसी घटना को बताने लग गया कि मैंने कईयों को ऐसे मुफ्त में सफ़र कराया है, सबने यही बात कही की घर पहुँचते ही पैसे वापस कर दूँगा, लेकिन आजतक किसी ने भी पैसे वापस नहीं किये। फिर, चालक महोदय भी बात करने लग गयें कि एक को तो मैंने मुफ्त में सफ़र भी कराये और घर जाने तक के लिए पैसे भी दिये; और जब उसका फोन नम्‍बर मिलाया तो फोन ही नहीं उठाता था। महीनों दिन तक उसका फोन नम्‍बर मिलाता रहा, लेकिन ऐहसानफ़रामोश ने धन्‍यवाद! तक नहीं कहा, इत्‍यादि बातें सुनाकर चालक महोदय भी अपनी भ्रास निकाल रहे थे और मुझे दिलासा दिलाने का प्रयत्‍न कर रहे थे। बातें करने से पता चल रहा था चालक व उपचालक दोनों हरियाणा के हैं। मैंने कहा— हर आदमी एक जैसा नहीं होता है, इस दुनिया में अच्‍छे-बुरे हर तरह के इंसान सफ़र करते हैं। किसी के चेहरे पर तो नहीं लिखा रहता है कि यह चोर-बेईमान है या सज्‍जन है। अब उसी ढाबे वाले को ले लीजिए, जिसने मेरी मदद की और बिना जान-पहचान के उसने ३५० सौ रूपये दिये... मेरे बगल के सीट पर बैठे अंकल जी से काफी दूर तक बातें होती रही। उन्‍होंने भी कहा— अगर मेरे पास पर्याप्‍त नगद होते तो, मैं आपकी मदद करता। मैंने अंकल जी कहा— कोई बात नहीं आपने ऐसा कहा यही बहुत है, आज के ज़माने में कौन, किसी को मदद करता है। खासकर अंजान व्‍यक्ति को तो कोई भी मदद नहीं करना चाहता है। मैंने कहा— उस ढाबे वाले का ऐहसान कभी नहीं भूलूँगा, जिसने बिना कुछ मेरे बारे में जाने वगैर ३५० सौ रूपये की सहायता की। अंकल जी से मेरी बातें जारी रही, उन्‍होंने अपने आप को हिमाचल की होने की बात कही और कहा बिहार के लोग बड़े ही मेहनती होते हैं। मैंने अपना पता बिहार का होने का बताया और दिल्‍ली में जॉब करता हूँ, इत्‍यादि... अंकल जी को चण्‍डीगढ़ तक जाना था, फिर वहाँ से कहीं और जाना था, जहाँ वे पुलिस में कार्यरत हैं। हर सप्‍ताह अपने गाँव हिमाचल चले जाते हैं और फिर वापस अपने काम पर आ जाते हैं। मैंने अंकल जी का नाम पूछा— उन्‍होंने अपना नाम सुरेश बताया, कुछ देर बातें होती रही और बातें करते-करते मैं सो गया। अंकल जी चण्‍डीगढ़ बस स्‍टैण्‍ड से पहले ही उतर गये थे। चण्‍डीगढ़ बस स्‍डैण्‍ड में बस रूकी। मैंने घड़ी देखा तो सवा एक बज चुके थे। ढाबे पर जाकर मैंने अपना फोन करीब १५ मिनट तक चार्ज किया। फिर बस खुली, चण्‍डीगढ़ से दिल्‍ली तक का आगे का टिकट बनवाया और बैठे-बैठे सो गया। दिल्‍ली में करीब पाँच बजे हमारी बस प्रवेश कर चुकी थी, करनाल बाईपास पहुँचते ही उपचालक ने कहा सामान वगैरह लेकर तैयार रहो, गाँधी विहार आने ही वाले हैं। गाँधी विहार के स्‍टैण्‍ड पर बस धीरे हुई और मैं बस से उतर गया। सुबह के सवा पाँच बज चुके थे। मैंने उतरने के थोड़ी देर बाद ही चलते-चलते अपने फोन से उस ढाबे वाले को फोन मिलाया और आभार व्‍यक्‍त किया और पैसे जल्‍द ही वापस लौटाने की बात कही; ढाबे वाले ने कहा कोई बात नहीं। घर पहुँचकर मैंने राहत की साँस ली और करीब १ घण्‍टे तक के लिए सो गया। आँख खुली तो सात बजने को थे। दफ्तर के लिए फटाफट तैयार हुआ और समय से दफ्तर पहुँच गया। दफ्तर में दिनभर काम में व्‍यस्‍त रहा और शाम करीब चार बजे मैंने उस ढाबे वाले से पैसे वापस करने के लिए बात किया। बात करने दौरान ही उसने कहा— क्‍या आपको मालूम है, आपके जाने के बाद क्‍या हुआ? मैंने उत्‍सुकता जताते हुए पूछा, क्‍या हुआ? उसने कहा— आपके जाने के आधे घण्‍टे बाद ही घर जाते हुए उस भाई को एक बोलेरो वाले ने कुचल डाला और उसकी मौत मौके पर ही हो गयी है। यह सुनकर मैं अवाक् रह गया। मुझे बहुत दु:ख हुआ और मन-ही-मन सोंचने लगा कि जिसने मेरे ऊपर उपकार किया, उसकी ऐसी मौत! जिसकी मौत हुई थी, उसी का बैंक खाता संख्‍या मैंने लिया था, जिसके खाते में मुझे पैसे ऑनलाइन वापस करने थे। मेरी बातें कुछ देर तक हुई तो मालूम चला, वे दोनों भले मानुष बिहार के निवासी हैं और जिसकी मौत हो गयी है वह पटना तथा कैशियर जिसने पैसे दिये थे बेगुसराय का है। अभी भी उस ढाबे वाले भाई से मेरी बातचीत होते रहती है, लेकिन वे पैसे लेने से मना कर रहा है; कहता है जिसने पैसे दिलवाये वो ही नहीं रहा तो पैसे कैसे वापस लूँॽ मेरा यहाँ पर बैंक में खाता नहीं खुला हुआ है। जब कभी भी मैं बिहार आऊँगा तो पैसे वापस ले लूँगा। मैंने कहा— आपका मैं उतने रूपये के मोबाइल रिचार्ज करा दे रहा हूँ, बात वही है मोबाइल में भी तो हर महीने खर्च होते ही हैं। लेकिन, फिर भी वह मना कर दिया और बोला आज के बाद पैसे के विषय में बातें करेंगे तो मैं आपसे बातें नहीं करूँगा। मैंने अपना पता और फोन नम्‍बर दे दिया और कहा भाई मैं अपना फर्ज निभा रहा हूँ, आपने मेरे ऊपर ऐहसान का बोझ डाल दिया है, बस! वही उतारने का प्रयास कर रहा हूँ। मैं उस मृत आत्‍मा को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ और उनकी आत्‍मा की शांति के लिए ईश्‍वर से प्रार्थना करता हूँ। इस दुनिया में चोर-बेईमान, झूठे-फरेबी हर तरह के लोग हैं, परन्‍तु सज्‍जन की भी कमी नहीं है। पता नहीं कौन, किस रूप में, कहाँ मिल जाए। बड़े-बूजूर्ग कहा करते थे— “नेकी कर, दरिया में डाल।”

संकलन: संजय साह










































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